एक ओर रेल मंत्री सुरेश प्रभु रेलवे के खर्चे कम करने और आय बढ़ाने के लिए नए नए प्रयोग कर रहे हैं। तो दूसरी ओर अधिकारियों की अनदेखी से रेलवे को नुकसान हो रहा है। नया कारनामा मुरादाबाद से संभल के बीच चलने वाली डेमू का है।
डेमू के इंजन की विंड स्क्रीन (फ्रंट शीशा) टूटने पर नया शीशा लगाने के बजाय उसमें लोको (हैवी इंजन) लगा दिया गया। तब से गाड़ी उसी इंजन ls चलाई जा रही है। जिसके कारण रेलवे को हर दिन हजारों रुपये का नुकसान हो रहा है।
मुरादाबाद से संभल जाने वाली डेमू के संभल साइड के इंजन की विंड स्क्रीन पर सोमवार किसी ने पत्थर मार दिया था। जिसके कारण विंड स्क्रीन टूट गई थी। रेलवे के मैन्युअल के अनुसार विंड स्क्रीन टूटी होने पर ट्रेन को नहीं चलाया जा सकता। जबकि डेमू में जो इंजन होते हैं वे उसके साथ ही होते हैं उन्हें अलग नहीं किया जा सकता।
शा टूटने के कारण ट्रेन भी नहीं रोकी जा सकती। ऐसे में ट्रेन का संचालन करने के लिए उसमें एक्सप्रेस ट्रेन को चलाने वाला इंजन जोड़ दिया गया और ट्रेन को रवाना कर दिया गया। डेमू अपने इंजन से मुरादाबाद से संभल तक जाने और आने में केवल 100 लीटर डीजल जलाती है।
जबकि हैवी डीजल इंजन लगाने से उसका खर्चा तीन गुना बढ़ जाता है। हैवी डीजल इंजन के में डीजल की खपत तीन सौ लीटर तक होती है। आपात स्थिति में खर्चा कोई मायने नहीं रखता, लेकिन चार दिन तक उसी इंजन से डेमू चलाना रेलवे अधिकारियाें की लापरवाही को दिखाता है।
विंड स्क्रीन में लगने वाले शीशे की कीमत लगभग तीन हजार रुपये है। लेकिन उसे बदलने के बजाय तीन गुने खर्चे पर ट्रेन चलाई जा रही है। हर दिन प्रति चक्कर दस हजार रुपये अधिक का खर्चा बढ़ रहा है। दो चक्कर लगाने पर बीस हजार रुपये। जो चार दिन में अस्सी हजार रुपये हो जाता है।
जबकि डेमू के संचालन में केवल एक ड्राइवर लगता है और एक्सप्रेस के हैवी इंजन को चलाने में लोको पायलट और असिस्टेंट लोको पायलट की जरूरत पड़ती है। यहां भी दो लोग लगाए जा रहे हैं।
इस संबंध में अधिकारियों का कहना है कि डेमू का शीशा मिल नहीं पाने के कारण व्यवस्था करनी पड़ी है। ट्रेन सर्विस के हर शनिवार को वर्कशाप में जाती है तभी उसे ठीक कराया जाएगा।