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गलवां घाटी में माइनस 45 डिग्री तापमान के बावजूद डटे रहते हैं भारतीय जवान, सेवानिवृत्त सैनिक ने साझा कीं यादें 

आसिफ इकबाल अंसारी, अमरोहा Published by: अवधेश कुमार Updated Thu, 18 Jun 2020 12:57 AM IST
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गलवां घाटी में भारत-चीन के बीच हुई हिंसक झड़प - फोटो : Amar Ujala

गलवां घाटी में हालात बेहद प्रतिकूल हैं। अक्साई चीन से लगता हिस्सा बेहद महत्वपूर्ण है। तापमान माइनस 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। कठिन हालात में रह कर भी भारतीय सैनिकों का हौसला आसमान पर रहता है। वहां धूप निकलती है। बहुत तेज, लेकिन बगैर चश्मा के नहीं रह सकते क्योंकि जब सूरज की किरणें बर्फ पर पड़ती हैं तो आंखों को नुकसान की आशंका रहती है। पानी को गर्म करके रखना पड़ता है।

नौगांवा सादात के करार नगर-कैलबकरी निवासी सेवानिवृत्त सैनिक तेजवीर सिंह गलवां घाटी में आठ महीने अपनी सेवा दे चुके हैं। वह 81 फील्ड रेजीमेंट (तोपखाना) में तैनात रहे हैं। बताते हैं कि गलवां घाटी में अगस्त 2018 से मार्च 2019 तक अपनी सेवा दी। रास्ते में पहाड़ियों की वजह से हाइट बढ़ती जाती है। जाड़े में रास्ते बंद हो जाते हैं। ठंड में ज्यादातार मूवमेंट नहीं होती। खाने के लिए पर्याप्त राशन रहता है। रात को हल्का खाना खाते हैं। मौसम सही होने पर वाहन चलते हैं। हेलीकॉप्टर से आते-जाते हैं। 

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गलवां घाटी में भारत-चीन के बीच हुई हिंसक झड़प - फोटो : Amar Ujala
गलवां घाटी में हालात बेहद प्रतिकूल हैं। अक्साई चीन से लगता हिस्सा बेहद महत्वपूर्ण है। तापमान माइनस 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। कठिन हालात में रह कर भी भारतीय सैनिकों का हौसला आसमान पर रहता है। वहां धूप निकलती है। बहुत तेज, लेकिन बगैर चश्मा के नहीं रह सकते क्योंकि जब सूरज की किरणें बर्फ पर पड़ती हैं तो आंखों को नुकसान की आशंका रहती है। पानी को गर्म करके रखना पड़ता है।

नौगांवा सादात के करार नगर-कैलबकरी निवासी सेवानिवृत्त सैनिक तेजवीर सिंह गलवां घाटी में आठ महीने अपनी सेवा दे चुके हैं। वह 81 फील्ड रेजीमेंट (तोपखाना) में तैनात रहे हैं। बताते हैं कि गलवां घाटी में अगस्त 2018 से मार्च 2019 तक अपनी सेवा दी। रास्ते में पहाड़ियों की वजह से हाइट बढ़ती जाती है। जाड़े में रास्ते बंद हो जाते हैं। ठंड में ज्यादातार मूवमेंट नहीं होती। खाने के लिए पर्याप्त राशन रहता है। रात को हल्का खाना खाते हैं। मौसम सही होने पर वाहन चलते हैं। हेलीकॉप्टर से आते-जाते हैं। 

सब्जी को काटने से पहले गर्म पानी में उबालते हैं

सब्जी को रख देने पर वह सख्त हो जाती है। खाना बनाने के लिए पहले पानी में उबालना पड़ता है। इसके बाद सब्जी को काटते हैं। टमाटर बिल्कुल बर्फ का टुकड़ा हो जाता है क्योंकि उसमें पानी रहता है। 

पेड़-पौधे नहीं हैं इसलिए ऑक्सीजन की रहती है कमी

गलवां घाटी में पेड़-पौधे नहीं हैं। इसके चलते ऑक्सीजन की कमी रहती है। सिरदर्द और हार्ट अटैक हो जाता है। ऐसे में पानी खूब पीते हैं। भौगोलिक हालात बेहद प्रतिकूल हैं। हरियाली देखने के लिए तरस जाते हैं। 

शरीर को वातावरण के अनुकूल ढालने में लगते हैं कई दिन 
 
समुद्र तल से ऊंचाई बढ़ने से दिक्कत आती है। वहां के लिए बॉडी को अनुकूल करना पड़ता है। गलवां घाटी का सफर कई दिनों में तय होता है। कई जगहों पर मेडिकल चेकअप होता है। उसके बाद गलवां घाटी जाते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे शिफ्ट होते हैं। एक बार जाने पर तीन से चार महीना रहना पड़ता है।







 

के पलानी के साथ 17 साल किया काम, शहादत से खौल उठा खून
 
तेजवीर सिंह ने बताया कि गलवां घाटी में चीनी सेना से झड़प में हवलदार के पलानी की शहादत की खबर मिली है। इस खबर ने झकझोर दिया है। अजीब सा महसूस हो रहा है। अगस्त 2002 से 31 मार्च 2019 तक लगातार काम किया। उनकी शहादत से खून खौल उठा है। हवलदार के पलानी बहुत अच्छी शख्सियत के मालिक थे। हॉकी के प्लेयर के अलावा क्रॉस कंट्री में भी दौड़ लगाते थे। हम लोगों को प्रोत्साहित करते थे। मदुरई तमिलनाडु के रहने वाले थे। उनके परिवार से बात हुई है। कई साथी घायल हुए हैं। हम लोगों ने 17 साल तक साथ में काम किया हैं। खाना और रहना सब कुछ याद आ रहा है।

बीमार होने पर की थी रात भर देखभाल, लगता है उन्होंने मेरी जान बचाई

दिसंबर 2018 की एक रात में सांस लेने में दिक्कत होने लगी। सभी सैनिक आस पास आ गए। हवलदार के पलानी रात भर मेरे पास ही रहें। उन्होंने बड़े भाई की तरह देखभाल की। पानी पिलाया। ऐसा महसूस होता है कि उन्होंने ही मेरी जान बचाई है।
 
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