देश अपने गणतंत्र की 74वीं वर्षगांठ मना रहा है। हर ओर खुशी का माहौल है। ऐसे में कुछ बुजुर्ग भी हैं, जो उस स्वतंत्रता और गणतंत्र के साक्षी रहे हैं। उस दौरान किसी का बचपन था तो कोई कॉलेज के दिनों में रेडियो पर प्रसारण सुन रहा था। ऐसे ही शहर के बुजुर्गों ने बताया कि आजादी की खुशी में पूरी रात शहर नहीं सोया था। वहीं किसी को रेडियो पता चला कि संविधान लागू हो गया है। पढ़िए ऐसे ही अनसुने किस्से...
सभा में अंग्रेज करते लाठी चार्ज, शक पर दे देते थे फांसी
रामगंगा विहार कॉलोनी में रहने वाले अंबिका प्रसाद इंटर कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य सुरेश दत्त शर्मा पथिक बताते हैं कि, नौ फरवरी 1926 की उनकी पैदाइश है। आजादी से गांधी जी और नेहरू जी की सभा भी उन्होंने देखी व सुनी है। पं. जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी समेत कई नेताओं ने यहां टाउनहाल, बुध बाजार आदि स्थानों पर सभाएं की। सभा में लोग एकत्र न हों सकें इसके लिए अंग्रेज लाठीचार्ज करते थे। उनकी न्याय व्यवस्था भी ऐसी थी कि किसी गांव में अगर कोई कत्ल हो जाता तो बिना किसी सबूत के शक पर पकड़ कर फांसी चढ़ा देते थे।
आजादी के बाद कई सालों तक घरों में फहराया गया तिरंगा
देश जब आजाद हुआ तो खुशी में पूरा शहर सोया नहीं। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक में गजब की खुशी और उत्साह था। हर तरफ भारत माता की जय, इंकलाब जिंदाबाद के नारे गूंज रहे थे। अंग्रेजों के झंडे उतार तिरंगा लगा दिया गया। मैं तब कानूनगोयान मोहल्ले में रहता था। वहां हवन और कीर्तन हुआ। पटाखे बजाए गए। हर घर पर तिरंगा फहराया गया। पहले गणतंत्र का झंडा टाउनहाल में फहराया गया। शहर भर से तमाम लोग वहां पहुंचे थे। कई साल तक 15 अगस्त और 26 जनवरी को सभी लोग अपने-अपने घरों पर भी तिरंगा फहरा कर खुशी मनाते रहे।
फूलों, कागज की झंडियों से सजा था शहर
हकीम सैयद मासूम अली आजाद, शहर इमाम कहते हैं कि, मैं 87 साल का हूं। देश जब आजाद हुआ तब मेरी उम्र 11 साल थी। आजादी से पहले सभाओं में मेरे वालिद अपने साथ मुझे भी ले जाते थे। जाति धर्म का कोई भेदभाव नहीं होता था। स्वतंत्रता आंदोलन में सभी ने एक दूसरे के साथ मिल कर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। जब आजादी मिली तो उस दिन पूरे शहर में खुशी थी। हर गली, मोहल्ले में भारत माता की जय, हिंदू-मुस्लिम, सिख इसाई आपस में सब भाई-भाई के नारे लगा रहे थे। घरों पर लोगों ने तिरंगे झंडे फहराए। फूलों और कागज की रंग बिरंगी झंडियों से शहर में कई जगह सजावट की गई थी। पहले गणतंत्र का झंडा टाउनहाल पर फहराया गया था। काफी लोगों ने वहां भाग लिया। पहले सभी आपस में मिलकर रहते थे। अभी भी पुराने लोगों में वही मिल्लत है।
रेडियो से पता चला कि संविधान लागू हो गया
चित्रगुप्त इंटर कॉलेज के प्रबंधक डॉ. अनंत प्रसाद शमशेरी कहते हैं कि, मैं वर्ष 1950 में आगरा कॉलेज का विद्यार्थी था, वहीं हॉस्टल में रहता था। रेडियो से पता चला कि हमारे देश का संविधान लागू हो गया है। हर नागरिक को कुछ विशेष अधिकार दिए गए हैं। इसे सुनकर तीन साल पहले (1947) की यादें ताजा हो गईं जब हमें आजादी मिली थी। मुझे याद हैं रेडियो पर सुने गए वो शब्द जब देश के पहले भारतीय गर्वनर जनरल चक्रवर्ती रापालाचारी ने भारत को संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारतीय गणतंत्र के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ दिलाई गई थी। उन्हें तोपों की सलामी दी गई थी।
हम सभी छात्रों ने हॉस्टल में तिरंगा फहराकर खुशी मनाई थी, पूरे दिन हॉस्टल में देश भक्ति गीत और वंदे मातरम गूंजता रहा था। मुझे जब भी मौका मिलता है मैं छात्रों से साझा करता हूं वो सुनहरी यादें जिनसे आज भी मेरे अंदर ऊर्जा दौड़ जाती है। 1947 में तो मैं एसएस इंटर कॉलेज का कक्षा 10 का विद्यार्थी था। हमने अंग्रेजों को शहर से जाते देखा है। शहर की हर सड़कों पर आजादी का जुलूस निकाला था। बुध बाजार के सिनेमाघरों में फिल्मों के शो मुफ्त कर दिए गए थे। आज काफी कुछ बदल गया है लेकिन जो कभी नहीं बदलेगा वह है आजादी का उत्सव, उसके पीछे का संघर्ष और गणतंत्र घोषित होने की खुशियां।
मोहल्ले के लोगों ने बनाई थी रंगोली
हरथला निवासी शिवदयाल सिंह ने बताया कि पहले गणतंत्र दिवस पर मेरी उम्र करीब 14 वर्ष की थी। सुबह के समय जब हम सोकर जगे थे तो हमारे घर रेडियो पर गणतंत्र दिवस का समाचार आ रहा था। उन्होंने बताया कि देश में कानून लागू हो गया है। आजादी के बाद अपने संविधान को लेकर लोगों में अलग ही जोश था। जगह.जगह गांधी जी और स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरें हाथ में लेकर लोग मिठाई बांट रहे थे। पार्कों में बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए थे। हमने भी अपने घर पर तिरंगा लगाया था। उस झंडा को लेकर अलग ही कौतूहल था। हमारे मोहल्ले के लोगों ने रंगोली बनाई थी।