बिलासपुर(रामपुर)। घूमाफिरी, पर्यटन, मौजमस्ती आमतौर पर नौजवानों की प्रकृति मानी जाती है लेकिन बिलासपुर के 32 वर्षीय अमन शर्मा अलग सोच के साबित हुए। पर्यटन स्थल पर घूमने का इरादा बनाया तो पिता ने उन्हें खर्च के लिए 50 हजार रुपये दे दिए। एकमुश्त ठीकठाक रकम हाथ में आई तो अमन को लगा कि इससे कुछ ऐसा काम शुरू किया जाए, जो जरूरतमंदों के लिए मददगार बन सके। इसी सोच ने कस्बे में दादी की रसोई की शुरुआत करा दी। ऐसी रसोई, जो असहाय लोगों को निशुल्क भोजन उपलब्ध कराती है तो मध्य वर्गीय जरूरतमंदों को महज पांच रुपये में भरपेट भोजन की सुविधा देती है।
परिजनों और अपने परिचितों में मन्नू के नाम से लोकप्रिय डैम कालोनी निवासी अमन को ढाई साल पहले पिता जयदीप शर्मा ने 50 हजार रुपये दिए थे। यह रकम उनके दूसरे किसी शहर में घूमने जाने की इच्छा जताने पर दी गई थी। अमन बताते हैं कि जब 50 हजार रुपये हाथ में आए तो लगा कि इतनी बड़ी रकम को घूमाफिरी पर उड़ाने की बजाय किसी नेक काम में लगाया जाए। बताते हैं कि उस समय जाड़े का मौसम था। पहले सोचा कंबल बांटें लेकिन फिर लगा कि यह मदद चंद लोगों और कुछ समय तक की सीमित रह जाएगी। कुछ ऐसा करें कि मदद की निरंतरता बनी रहे।
अमन के मुताबिक मदद के विकल्प जानने के लिए नेट की मदद ली तो नोएडा में निशुल्क व सस्ता भोजन बांटने वाली एक संस्था का उदाहरण देखने को मिला। इस उदाहरण से अपनी दिनचर्या में नजर आने वाले वो गरीब व दिव्यांग याद आ गए, जो खाने के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं। दादी शांति देवी की याद में निशुल्क भोजन सेवा की शुरुआत करने का इरादा बनाया। ज्यादा जरूरतमंदों तक मदद पहुंचाने और लंबे समय तक संचालन करने के लिए धन की उपलब्धता का क्रम जरूरी है, यह सोचकर कुछ करीबियों से योजना पर चर्चा की। इस पर डॉ. वीके सिंह, पवन शौरी, डॉली शर्मा, अंकित नैयर सहित कुछ परिचित सहयोग को आगे आ गए। इसके बाद दादी की रसोई नाम से भोजन वितरण की शुरुआत कर दी।
अमन बताते हैं कि अपनी खेती और कारोबार से होने वाली आय का कुछ हिस्सा इस काम में लगाते हैं। दिव्यांगों, गरीबों और असहाय लोगों को निशुल्क भोजन देते हैं। मध्य वर्ग के जरूरतमंद को पांच रुपये में भोजन की सुविधा उपलब्ध कराते हैं। पांच जनवरी 2020 से शुरू हुई यह सेवा अब तक अटूट जारी है। लगभग ढाई साल की अवधि में इससे लाभान्वित होने वालों की संख्या वक्त के साथ बढ़ रही है। अमन कहते हैं, इस प्रयास से मुझे व अन्य साथियों को जो चैन मिलता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।