चुनार। रामचरित मानस में ताड़का आशा का, मारिच काम का और सुबाहु सांसारिक मोह के प्रतीक हैं। यदि प्रवृत्ति विभीषण हैं तो हनुमान निवृत्ति के प्रतीक माने जाते हैं। सत्संग से सबको सुख मिलता है, लेकिन संत को तब सुख मिलता है, जब वह संसार से सुखी देखता है। यह बातें मंगलवार को रामकथा के दौरान कथा वाचक स्वामी सच्चिदानंद जी ने बताई।
नगर में चल रही रामकथा में व्यासपीठ पर विराजमान कथा वाचक स्वामी सच्चिदानंद जी ने भक्ताें को रामकथा का रसास्वादन कराते हुए कहा कि तुम्हारा तो तुम्हारी ही है, लेकिन हमारा भी तुम्हारा है, यह सिर्फ एक संत की ही वाणी हो सकती है। कहने का तात्पर्य है कि जीवन की विधि ठीक है तो परमात्मा की कृपा आती है और ठीक नहीं है तो परमात्मा की कृपा चली जाती है। स्वामी जी ने कहा कि संत चिंतन करता है, शेष चिता करते हैं। देर रात चली रामकथा का श्रवण कर भक्तजन भावविभोर होकर भक्ति सागर में डूबकी लगाते रहे। आयोजन की अध्यक्षता महंथ राम मंदिर डा. गणेश प्रसाद मिश्र ने किया। रामकथा का श्रवण करने आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में नर-नारी आए हुए थे। रामकथा के बीच-बीच में श्रीराम के जयघोष से पूरा इलाका भक्तिमय हो रहा था। चुनार नगर में चल रहे रामकथा के दौरान मधुर भजनों का श्रवण कर भक्तजन मंत्रमुग्ध हो गए। इस दौरान कमलेश्वर कमल, राधे मोहन श्रीवास्तव, सुरेंद्र त्रिपाठी, राम सिंह, विजय वर्मा, रेखा वर्मा सहित बड़ी संख्या में नर-नारी उपस्थित रहे।