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यूपी का रण : इस बार कौन भेदेगा हस्तिनापुर का चक्रव्यूह, ऐतिहासिक नगरी को मिथक टूटने का इंतजार

Fri, 28 Jan 2022 05:40 AM IST
दुष्यंत शर्मा अरीश रिजवी, मेरठ

सार

आज बात करते हैं हस्तिनापुर की। वही हस्तिनापुर, जिसका चक्रव्यूह से गहरा नाता रहा है। यहां चुनावी समरभूमि में पग-पग पर जाल बिछे हैं। कब कौन अपना ही सपनों का शिकार कर जाए, पता नहीं। 
 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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महाभारत काल में राजधानी रहा हस्तिनापुर सियासी रण की वजह से एक बार फिर सुर्खियों में है। चक्रव्यूह रचा जा चुका है। सभी प्रमुख दलों के योद्धा मैदान में आ चुके हैं। मतदाता भी धीरे-धीरे चुप्पी तोड़ने लगे हैं। कहा जाता है कि चुनाव में हस्तिनापुर की जनता जिस दल को जीत दिलाती है, उसी की सरकार लखनऊ में बनती है। शायद यही वजह है कि यहां सभी खेमों ने यहां ताकत झोंक दी है।

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मेरठ जिले की हस्तिनापुर सीट बिजनौर लोकसभा क्षेत्र में आती है। वर्ष 1957 में वजूद में आई यह सीट 1967 में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई। भाजपा को इस सीट पर पहली बार 1994 में गोपाल काली ने जीत दिलाई, तो 2017 में दिनेश खटीक जीते। सीएम योगी आदित्यनाथ ने सितंबर 2020 में दिनेश खटीक को प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री बनाया।

खटीक के सामने यहां रालोद के गठबंधन में चुनाव लड़ रही सपा ने पूर्व विधायक योगेश वर्मा को प्रत्याशी बनाया है। वर्मा 2007 में बसपा के टिकट पर इसी सीट से विधायक बने थे। 2012 में टिकट कटा तो वह बगावत कर पीस पार्टी से मैदान में कूद पड़े। बहरहाल, उन्हें सपा के प्रभुदयाल बाल्मीकि से हार का सामना करना पड़ा था। वर्मा को बसपा ने यहां से 2017 में फिर उम्मीदवार बनाया लेकिन एक बार फिर उनके हिस्से हार ही आई।
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अलबत्ता, योगेश वर्मा की पत्नी सुनीता 2017 में ही मेरठ शहर से मेयर चुनी गईं। इस बार वर्मा सपा-रालोद के साझा उम्मीदवार हैं। कांग्रेस ने यहां से अभिनेत्री अर्चना गौतम को प्रत्याशी बनाया है। अर्चना स्थानीय हैं और  उनका यह पहला चुनाव है। बसपा ने भी यहां नए चेहरे संजीव जाटव पर दांव लगाया है। इस सीट को पहली बार भाजपा की झोली में डालने वाले गोपाल काली ने खटीक के खिलाफ  खुली बगावत कर रखी है। वह खटीक के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं।

राज्यमंत्री दिनेश को ये दे रहे चुनौती
दिनेश खटीक, भाजपा

मजबूती : मोदी-योगी सरकार के काम। मौजूदा मंत्री।
कमजोरी : सम्राट मिहिर भोज विवाद को लेकर गुर्जरों में नाराजगी है।

योगेश वर्मा, सपा-रालोद
मजबूती : किसान आंदोलन का असर। दलितों की बहुलता।
कमजोरी : विधायक रहते हुए कई विवादित मामलों में चर्चा में रहे।

अर्चना गौतम, कांग्रेस
मजबूती : पेशे से अभिनेत्री हैं। बोल्ड अंदाज को लेकर चर्चा। बड़ी पार्टियों से एकमात्र महिला प्रत्याशी
कमजोरी : सियासत का अनुभव नहीं।

संजीव जाटव, बसपा
मजबूती : दलित वोट बैंक। नए प्रत्याशी हैं, किसी तरह का कोई विवाद नहीं जुड़ा है।
कमजोरी : इस बार 3 दलित चेहरे मैदान में हैं।

वोटों का गणित
3,42,314 कुल मतदाता
84 हजार मुस्लिम
69 हजार गुर्जर
50 हजार दलित
26 हजार जाट
12 हजार सिख, सिंधी

2017 का परिणाम
दिनेश खटीक, भाजपा  99,436
योगेश वर्मा, बसपा  63,374
प्रभुदयाल बाल्मीकि, सपा 48,979
कुसुम, रालोद 6,538

द्रौपदी का श्राप या सियासत...चंडीगढ़ नहीं बन सका हस्तिनापुर
हस्तिनापुर का अपना ऐतिहासिक  महत्व है। यहां के टीलों के नीचे महाभारत काल की गाथाएं हैं। आजादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने हस्तिनापुर को चंडीगढ़ की तर्ज पर विकसित करने की घोषणा की थी। पंडित नेहरू के समय का वह पत्थर आज भी यहां मौजूद है। सात दशक बीत गए, लेकिन हस्तिनापुर चंडीगढ़ नहीं बन सका। कहा जाता है कि चीरहरण के वक्त द्रोपदी ने हस्तिनापुर को श्राप दिया था कि जहां नारी का अपमान होता है वहां कभी तरक्की नहीं हो सकती। बहरहाल, हस्तिनापुर को मिथकों के टूटने का इंतजार है।

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