ये व्यथा सिर्फ मेरी अपनी, ये दर्द फकत मेरा अपना
मेरठ। कैसे कैसे रिश्ते टूटे, कैैसे कैसे अपने छूटे, ये दर्द फकत मेरा अपना, ये व्यथा सिर्फ मेरी अपनी। गीत कवि भारतभूषण की पुण्यतिथि पर अपनों द्वारा भुलाए जाने का दर्द कुछ इसी तरह बयां हुआ। हिंदी काव्य साहित्य की अमूल्य निधि गीत कवि स्व. भारतभूषण की पुण्यतिथि पर काव्यशाला, कलम की ओर से ऑनलाइन काव्य गोष्ठी का संयोजन भारतभूषण के दामाद वीके सक्सेना व बेटी जूही ने किया। आयोजन की अध्यक्षता रिटायर्ड आईएएस डॉ. आरके भटनागर ने की।
गोष्ठी का शुभारंभ सुमनेश सुमन ने किया। भारतभूषण के मित्र राजेश चंद्रा ने उनकी स्मृृति में गीत प्रस्तुत किया। संचालन डॉ. रामगोपाल भारतीय ने किया। इस दौरान सत्यपाल सत्यम ने पढ़ा, बिना बरसे कोई बादल कभी बादल नहीं बनता, न जिसमें प्यार का कोई निशा आंचल नहीं बनता। मनोज कुमार मनोज ने ‘उताल तरंग सा नेह तुम्हारा तुम सरिताओं के स्वामी’ सुनाया। आदर्शिनी श्रीवास्तव ने कहा कि कैसे-कैसे रिश्ते टूटे, कैसे कैसे अपने छूटे, ये दर्द फकत मेरा अपना, ये व्यथा सिर्फ मेरी अपनी।
यशपाल कोत्सायन ने गीत मंचों से दुखी हो, रुखसती करने लगे सुनाया। डॉ. रामगोपाल भारतीय ने कहा कि बिटिया, तू क्यों डरी डरी है, नारी के सबला होने की कथा तुझे फिर लिखवानी है। ब्रजराज किशोर राहगीर ने जिसे ढूंढा किए है हम वही आखिर नहीं मिलता सुनाया। संजय शर्मा ने हम तो पाकीजा थे तुलसी की तरह आंगन की, कैसे मुरझा गये पुरवाइयों से पूछेंगे सुनाया। डॉ. सरोजिनी 'तनहा' ने कहा कि किसी मुकाम पर आकर ठहर नहीं सकते, उड़ान में हैं अभी पर कतर नहीं सकते।