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UP: आजादी के आंदोलनों की गवाह रही रासना की क्रांति भूमि, अंग्रेजों के जुल्म सहते हुए जारी रखा था इंकलाब

Thu, 26 Jan 2023 12:53 PM IST
कपिल kapil शाह आलम त्यागी, संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ

सार

Republic Day 2023 : रासना गांव के लोगों ने आजादी के आंदोलनों में अहम भूमिका निभाई है। अंग्रेजों के जुल्म सहते हुए भी इंकलाब जारी रखा था। पढ़िए ये खास रिपोर्ट।
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रासना गांव। - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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देश की आजादी में सत्याग्रह से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन लड़ाई में क्रांति गांव रासना का अहम योगदान रहा है। अकेले रासना गांव में 17 लोगों ने आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई। अंग्रेजों ने आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता संघर्ष में जमकर लाठियां बरसाईं, लेकिन आजादी के दीवानों ने तमाम जुल्म सहने के बाद भी इंकलाब जारी रखा। सबसे पहले रासना की धरती पर एक केंद्रीय आश्रम बनाकर देहात के नौजवानों की कताई और बुनाई का प्रशिक्षण शुरू किया। जिसके माध्यम से अंग्रेजी हुकुमत के दौरान देहात के लोगों को हर प्रकार की शिक्षा और मार्ग दर्शन मिलत रहे। 

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उस समय यह प्रस्ताव अखिल भारतीय चर्खा संघ के कोषाध्यक्ष शंकरलाल बैंकर के सामने रखा गया। देहात के नौजवानों के लिए इस योजना को तुरंत स्वीकृति देकर आश्रम की शुरुआत की गई। सबसे पहले गांव में दरभंगा बिहार के श्याम भाई,हरगोविंद एक व्यापारी परिवार के यहां गांव में काम करने आए थे। उस समय गांव में मजबूत सूत कातने में चौ. न्यादर सिंह की बुआ भवानी देवी ने सभी को कार्य में निपुण किया। 

सबसे पहले गांव के खुदाबख्श नाम के जुलाहे ने सादे हाथ करघे से सवा गज की धोती बुनकर तैयार की। फिर तो खादी और चर्खे के माध्यम से रासना ही नहीं आसपास के गांवों में राष्ट्रीय चेतना का उदय हो रहा था। आश्रम में शामिल होने वाले युवाओं की टोली बढ़ने लगी और प्रभात फेरियों के माध्यम से ग्रामीणों को स्वाधीनता के अधिकार को समझाया। इन प्रभात फेरियों और जुलूसों से अंग्रेजी आतंक के जो बादल छाए हुए थे धीरे-धीरे छंटने लगे। तभी गांधी जी के आह्वान पर 1930 में असयोग आंदोलन चला।

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रासना में श्याम भाई के नेतृत्व में एक जुलूस निकाला गया, जिसमें 14 सत्याग्रही शामिल थे। पुलिस ने झूठा मुकदमा लगाकर 14 लोगों को मेरठ जेल भेज दिया। कार्य का विस्तार होता रहने से चौपाल का आवास छोटा पड़ रहा था। तभी नत्थू नम्बरदार में ईश्वरीय प्रेरणा से गांधी आश्रम के नाम सात बीघा भूमि दान पत्र में पंजीकृत करा दिया। जिसके बाद अंग्रेजों ने चौ. नत्थू सिंह को कई प्रकार से भयभीत किया, लेकिन गुलामी के युग में टस से मस नहीं हुए। 

जंगल में झाड़ काटकर तैयार किए गांधी आश्रम की व्यवस्था एक तपस्वी जयराम शर्मा देखने लगे। वहां रहने वाले स्वाधीनता सेनानी अपने लिए हाथ की चक्की से आटा पीसते और खुद भोजन बनाकर खाते थे। कई वर्षों तक गांधी आश्रम का यह प्रशिक्षण कार्य चलता रहा किंतु अंग्रेजी सरकार ने 1933 में जब्त करके अपने अधिकार में ले लिया। गांधी आश्रम के कताई बुनाई केंद्र से भी अंग्रेजों को राजद्रोह को तीव्र गंध आने लगी थी। इस प्रकार से क्रांति मंदिर का दीपक नहीं बुझाया जा सका। तभी महान क्रांतिकारी आचार्य कृपलानी और पं. विचित्र नारायण का आगमन हुआ। 

इनके अलावा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी विषय में एमए उत्तीर्ण करने के बाद सादिक भाई अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महामंत्री बनने के बाद गांधी आश्रम के लिए नंगे पैरारें आजादी की अलख जगाई। इनके पीछे हर समय दो पुलिस के सिपाही लगे रहते थे। वहीं, राम लाल भाई व आचार्य रामदेव परीक्षा उत्तीर्ण कर अपने को राष्ट्र कार्य में झोंक दिया। भारत छोड़ा आंदोलन के जरिए फिरंगी हुकूमत के खिलाफ बिगुल बजा दिया था। आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेज सरकार ने सैकड़ों लोगों पर जुल्म किए।
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रासना गांव से सागर सिंह, ओमप्रकाश, बसंत सिंह भृंग, फूल सिंह सेठ, मिट्ठन लाल, भिक्कन, काले, मुंशी, रतीराम, डालचंद, बाबू सूरत सिंह, महाशय रेवा सिंह, उमराव, मास्टर सुंदरलाल, जहारिया, प्रणाम सिंह त्यागी एवं मास्टर रघुवीर सिंह त्यागी ने स्वाधीनता संग्राम में अहम भूमिका निभाई। गांव रासना स्थित गांधी आश्रम (वर्तमान में रासना इंटर कॉलेज) उस समय क्रांतिकारियों का अड्डा बन गया था। वहां आजादी के सिपाहियों ने अंग्रेजों से बचने के लिए भूमिगत जगह बना ली थी। 
बुजुर्गों का कहना है कि इस स्थान पर अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति बनाने के लिए आचार्य कृपलानी, जमनालाल बजाज, भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों के पैर इस धरती पर पड़े थे। मेरठ-बड़ौत मार्ग स्थित रासना मोड़ पर स्वतंत्रता सेनानी ने ग्रामीणों और श्री शालिगराम शर्मा स्मारक परिन्यास ट्रस्ट के सहयोग से सेनानी स्वर्ण जयंती द्वार की स्थापना कराई। जिस पर मेरठ जनपद के समस्त स्वतंत्रता सेनानियों के नाम अंकित हैं।

प्रबंध समिति के मंत्री प्रदीप त्यागी ने बताया कि 1942 से शुरू क्रांति का सिलसिला 1999 तक चलता रहा। जिसके बाद दो भाइ लेफ्टिनेंट कर्नल अमरदीप त्यागी व लेफ्टिनेंट कर्नल राजदीप त्यागी ने वर्ष 1999 में कारगिल में ऑपरेशन विजय पर जीत के गवाह बने। लेफ्टिनेंट कर्नल जबकि अमरजीत ने दो साल से वीआरएस ली और अब युवाओं को योद्धा मिलिट्री एकेडमी के जरिए सेना के लिए युवाओं को देश के लिए तैयार कर रहे हैं।
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