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370 खत्म: कश्मीरी परिवारों में जगी उम्मीद, 1947 में गदर का केंद्र था पुंछ, पढ़ें- दर्द भरी कहानी

Tue, 06 Aug 2019 03:31 AM IST
कपिल kapil आशुतोष भारद्वाज, अमर उजाला, मेरठ
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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अनुच्छेद 370 पर सरकार के बड़े फैसले के बाद मेरठ में बसे कश्मीरी परिवारों में एक नई उम्मीद जग गई है। लोगों का मनाना है कि वे अब अपने पुश्तैनी गांव जाकर यादों को ताजा कर पाएंगे। वहां फिर से अपने घर बना पाएंगे। इन परिवारों ने आजादी के बाद पुन: स्थापित होने के लिए तमाम मुश्किलों का सामना किया था। आजादी के समय कश्मीर से गांव के गांव खाली करा दिए गए थे। अमर उजाला ने ऐसे ही कुछ परिवारों से बातचीत कर उनके जज्बातों को समझने का प्रयास किया। इन परिवार में गुरुबचन सिंह, नरेंद्र सिंह, कुलजीत सिंह, अतुल्य शर्मा और रैना परिवार आदि हैं।

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गदर का मुख्य केंद्र था पुंछ  
जम्मू कश्मीर का पुंछ जिला 1947 में गदर का मुख्य केंद्र था। आबूलेन होटल करनाल के संचालक नरेंद्र सिंह ने बताया कि उनके पिता गुरुबचन सिंह और मां अमृत कौर पुंछ जिले में रहते थे। वहां उनका बड़ा मकान था। पिता मिठाई का व्यापार करते थे। गदर के दौरान गांव के गांव खाली करा दिए गए थे। उन्हें भी बेघर होना पड़ा। पिता ने पुन: स्थापित होने के लिए बहुत मेहनत की। रिक्शा चलाया, चाय की दुकान चलाई और धीरे धीरे परिवार की स्थिति को संभाला। 

घंटाघर के होटल में किया काम 
स्पेयर पार्ट्स व्यापारी कुलजीत सिंह ने बताया कि परिवार के अन्य लोग पंजाब, दिल्ली, लुधियाना आदि स्थानों पर रह रहे हैं। कुलजीत ने बताया कि गदर के दस साल बाद उनकी बुआ उन्हें बनारस में मिली थीं। गदर के दौरान नाना की पाकिस्तान के मीरपुर में मौत हो गई थी। वहीं नानी छह साल बाद राजपुरा पंजाब में एक शरणार्थी कैंप में मिलीं। पिता गुरबचन सिंह मां के साथ सिटी स्टेशन पर उतरे थे। वहां से वह शहर घंटाघर पहुंचे। यहां उन्होंने पिशोरी के होटल में काम किया।

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मेरठ में कश्मीर के हजारों परिवार
मेरठ में जम्मू-कश्मीर निवासी करीब एक हजार परिवार हैं। आबूलेन व्यापारी राजबीर सिंह ने बताया कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों ने जम्मू कश्मीर छोड़ा था। कई परिवार आज भी जम्मू में शरणार्थी के तौर पर रह रहे हैं। 1947 के गदर के दौरान लाखों हिंदू परिवार जम्मू कश्मीर छोड़कर देश के विभिन्न हिस्सों में बस गए थे। सैकड़ों लोग पंजाब और दिल्ली के आसपास आकर रहने लगे थे।

...फिर ताजा हो गए थे घाव 
शहर में 1984 से 1991 तक दंगे का माहौल रहा। नरेंद्र सिंह ने बताया कि दंगे के दौरान उनकी मां अमृत कौर कहती थीं कि क्या फिर गदर का सामना करना पड़ेगा। इस बीच पूरे परिवार के घाव दोबारा हरे हो गए थे। हालांकि माहौल धीरे धीरे शांत हो गया।

कश्मीरी ब्राह्मणों ने भी बनाया आशियाना  
आदर्शनगर निवासी अतुल्य शर्मा ने बताया कि उनका परिवार तीन पीढ़ी पूर्व मेरठ आकर बस गया था। उनके पिता बीएन शर्मा और माता आशा शर्मा उन्हें गदर के समय की बातें बताते थे। मुख्य रूप से उनका परिवार जम्मू में रहता था। अतुल्य ने बताया कि इसके अलावा मेरठ में रैना परिवार भी वेस्टर्न कचहरी रोड पर चौबे कंपाउंड में रह रहा है।

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