शहरकाजी प्रोफेसर जैनुस साजिद्दीन सिद्दीकी
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इस्लाम धर्म में नस्लवाद, जातिवाद और धार्मिक भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है। देश में सभी धर्मों के लोगों को भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द के साथ रहना चाहिए। अब इसी रास्ते पर चलकर आरएसएस भी विभिन्न धर्मों और जातियों को एक सूत्र में बांधने का कार्य कर रहा है। ईद उल अजहा (बकरीद) के त्योहार पर बुधवार को शहरकाजी प्रोफेसर जैनुस साजिद्दीन सिद्दीकी ने शाही जामा मस्जिद में नमाज से पहले तकरीर में ये बातें कही।
शहरकाजी ने गाजियाबाद में दिए गए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान का जिक्र करते हुए कहा कि देश को जोड़ने वाले किसी भी बयान को गलत नहीं कहा जा सकता है। शहरकाजी ने कहा कि बकरीद पर सिर्फ जानवरों की जान लेना कुर्बानी नहीं है, बल्कि अल्लाह के हुकुम को मानकर जज्बा दिखाना ही कुर्बानी है।
कहा कि महंगे जानवर खरीदकर उनकी नुमाइश करना बहुत गलत है। इस्लाम हमेशा इंसानियत को बचाने और सही रास्ते पर चलने का हुकुम देता है। नमाज के बाद शहरकाजी ने देश और दुनिया में कोरोना से राहत व अमनो अमान के लिए दुआ कराई।
इंसानियत को बचाने के लिए जानवर की कुर्बानी
शहरकाजी ने बताया करीब 4 हजार साल पहले अल्लाह के हुकुम को मानते हुए हजरत इब्राहिम (अ. स.) अपने मासूम बेटे इस्माईल को कुर्बानी के लिए लेकर चले गए।
अल्लाह ने अपनी मुहब्बत के लिए सिर्फ उनको आजमाने के लिए ऐसा किया। लेकिन, अल्लाह ने भी इंसानियत को बचाते हुए बेटे की जगह दुम्बा (बकरे जैसा दिखने वाला जानवर) हजरत इब्राहीम के सामने पेश कर दिया। शहरकाजी ने कहा अल्लाह को भी इंसानियत पसंद है, वरना आज अपने बेटों की कुर्बानी देनी पड़ती।