रोडवेज के खेल भी निराले हैं। मेरठ में भैसाली बस अड्डे की जमीन का रोडवेज के पास मालिकाना हक नहीं है और बस अड्डा शहर से बाहर जाना तय है। उसे रोकने का कोई ठोस आधार भी नहीं है। लेकिन उसके बावजूद रोडवेज कायाकल्प के नाम पर जनता का पैसा खुलकर लुटा रहा है।
यही नहीं, रोडवेज की जिस सेंट्रल वर्कशॉप पर रैपिड ट्रेन की वर्कशॉप बनना प्रस्तावित है, वहीं पर डिपो की बिल्डिंग शिफ्ट की जा रही है। सवाल उठता है कि जब भविष्य में बस अड्डा शहर से बाहर जाना ही है तो इतना पैसा क्यों बर्बाद किया जा रहा है।
रोडवेज का भैसाली और सोहराब गेट बस अड्डा शहर के बीच आ चुके हैं। इन अड्डों से संचालित होने वाली हजारों बसों के चलते जहां शहर में जाम लगता है तो वहीं वायु और ध्वनि प्रदूषण का भी स्तर बढ़ रहा है। चार साल से भैसाली और सोहराब बस अड्डा शहर से बाहर करने की कवायद चल रही है।
महायोजना 2021 में भी बस अड्डे शहर से बाहर जाना प्रस्तावित हैं। यहां पहला नंबर भैसाली अड्डे का है क्योंकि भैसाली बस अड्डे की सेंट्रल वर्कशॉप प्रशासन द्वारा रैपिड रेल के वर्कशॉप के लिए प्रस्तावित भी की जा चुकी है। लेकिन इन सबके बावजूद भी रोडवेज बस अड्डे को बाहर न करने पर अड़ा है। कुल मिलाकर भैसाली बस अड्डा अंगद के पांव की तरह जमा है और प्रशासन उसे हिला तक नहीं पा रहा है।