मेरठ। पहलगाम में आतंकी हमले के बाद से भारतीय का आक्रोश कम नहीं हुआ है। ऐसा ही गुस्सा 168 वर्ष पहले 1857 में देश में अंग्रेजी बेड़ियों को तोड़ने के लिए लोगों में था। यहां से क्रांति की ज्वाला की शुरूआत 85 सैनिकों ने की। विवादास्पद कारतूस प्रकरण के बाद हिंदू-मुस्लिम वर्ग के सभी लोग एकजुट हो गए थे।
मेरठ में सिपाहियों ने विवादास्पद कारतूसों के उत्तर में अंग्रेजों ने अन्य जगहों के समान तीसरी लाइट केवेलरी रेजिमेंट को भंग नहीं किया। इतिहासकार एके गांधी ने बताया कि विवादास्पद कारतूसों का प्रयोग करने से मना करने वाले सिपाहियों को कैद कर लिया गया। उन पर 6, 7 और 8 मई को कोर्ट मार्शल की कार्यवाही की गई। अंग्रेजों का विचार था कि इस कृत्य से भारतीय और भारतीय सिपाही भयभीत हो उठेंगे। इसके विपरीत तब सिपाही विचार करने लगे थे कि उन्हें क्या करना चाहिए।
एके गांधी ने बताया कि इस बीच साधु के वेशधारी स्वामी दयानंद पूरे घटनाक्रम पर बारीक नजर रखे हुए थे। इसी काम को पूरा करने के लिए वह मेरठ में भी आए थे। साधु काली पल्टन मंदिर में रहते हुए सिपाहियों में क्रांति के लिए जोश भरा जाता था। उन्होंने आसपास के गांवों में जो संपर्क सूत्र स्थापित किए थे। उन्हें भी वह सक्रिय करने का पुरजोर प्रयास कर रहे थे। उन्हें ज्ञात था कि ऐसा अवसर रोज नहीं मिलता। एक के गांधी ने बताया कि 7 मई 1857 को कोर्ट मार्शल का दूसरा दिन था। किसी भी प्रकार की सूचना को बाहर नहीं आने दिया जा रहा था। अफवाहों का बाजार गर्म था। सभी को अंग्रेजी न्याय के बारे में अच्छी तरह पता था कि सिपाहियों को सजा तो मिलनी ही थी। आज के दिन लगभग सभी गवाहियां पूरी हो चुकी थी। इस कारण अनिश्चितता का वातावरण पूरी तरह बन चुका था।