न्याय प्रक्रिया का मखौल इस प्रकार भी उड़ाया गया कि तीसरी रेजिमेंट के कमान अधिकारी ने 85 सिपाहियों में से 11 की सजा घटाकर 5 वर्ष कर दी। यह तर्क दिया कि वह 18 वर्ष से कम आयु के थे। एक कमान अधिकारी द्वारा कोर्ट मार्शल के निर्णय में परिवर्तन अधिकार अतिक्रमण के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता।
हिंदू फकीर के रूप में बाबा औघड़नाथ मंदिर में उपस्थित स्वामी दयानंद को भी शाम तक निर्णय ज्ञात हो गया। इतिहासकार एके गांधी ने बताया कि क्रांति की योजना बना रहे सभी लोग सिपाहियों को शांत देखकर गहन विचार में थे।
इस शांति के चलते कैसे क्रांति हो पाएगी। उन्हें आशा थी कि अगले दिन परेड ग्राउंड में सिपाहियों को सरेआम सजा दी जाएगी। जिसके बाद सिपाही भड़क जाएंगे। सभी लोग योजना बनाने में जुट गए। कई लोगों को स्पष्ट आदेश था कि उन्हें अपनी पहचान उजागर किए बिना ही क्रांति को भड़काना है।