फार्मासिस्ट का स्थानांतरण होने के बाद यहां दूसरे फार्मासिस्ट की तैनाती नहीं की गई है। इस कारण यहां चपरासी आमिर व स्टाफ नर्स ही मरीजों की पर्ची बनाने के साथ पर्चे पर लिखी जाने वाले दवाई देती हैं। लावड़ व एक दर्जन गांवों की लगभग 60 हजार जनसंख्या है। पीएचसी पर प्रतिदिन 80 से 90 मरीज आते हैं।
आवास हैं पर नहीं रुकता स्टाफ
कस्बे व आसपास के ग्रामीणों को पीएचसी में ही रात के समय आपातकाल सेवा मिले, इसके लिए वर्षों पहले आवास बनाए गए थे। आलम यह है कि आज तक आवास में कोई स्टाफ नहीं रुका। इस कारण यह आवास खंडहर में तब्दील हो रहे हैं। रात में आपातकाल सेवा के लिए मरीजों को सीएचसी दौराला के भरोसे ही रहना पड़ता है।
बैठने लगा पीएचसी का फर्श
पीएचसी परिसर मुख्य सड़क से गहराई में है। इस कारण बरसात में नाले का पानी पीएचसी में भर जाता है और उस समय मरीजों और स्टाफ को सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ती है। चिकित्सक डॉ. रविंद्र ने बताया कि लैब का फर्श पूरी तरह बैठ चुका है और अन्य कमरों के फर्श भी बैठने लगे हैं। इसके अलावा पीएचसी में पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं है जबकि पीएचसी परिसर में ही कस्बे को पानी की सप्लाई करने लिए ओवरहेड टैंक बना हुआ है।
तीन साल से नहीं महिला चिकित्सक
पीएचसी पर तैनात महिला चिकित्सक डॉ. रंजना का लगभग तीन साल पहले स्थानांतरण हो गया था। उनके स्थानांतरण के बाद यहां किसी महिला चिकित्सक की तैनाती नहीं की गई, जिस कारण गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए सीएचसी दौराला पर जाना पड़ता है।
ग्रामीण क्षेत्र की गर्भवती महिलाओं को सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ती है। रात में वाहन न चलने के कारण उन्हें घंटों एंबुलेंस का इंतजार करना पड़ता है। कस्बे से सीएचसी की दूरी लगभग सात किमी है, जबकि गांवों से सीएचसी की दूरी 10 से 12 किमी तक है।