निगम का कमेला राजनीति के झमेले में फंस गया है। जहां सरकार ने घोसीपुर में अत्याधुनिक कमेला बनाने के लिए निगम को 10 करोड़ रुपये भेजे हैं, वहीं महापौर कमेला के पक्ष में नहीं दिखाई दे रहे। हालांकि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष शहर की मांस आपूर्ति के लिए कमेले को बुरा नहीं बता रहे हैं।
ढाई साल से नगर निगम का घोसीपुर में कमेला बंद है। मानक पूरे न करने पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट पर शासन ने कमेले पर सील लगवा दी थी। कुछ समय तक तो शहर की मांस आपूर्ति पूर्व मंत्री हाजी याकूब की कंपनी में स्थित कमेले से की गई थी। उसके बाद पशुओं का कटान शहर की गली मोहल्लों में हो रहा है। पशु कटान शहर की मांस आपूर्ति के लिए ही नहीं, बल्कि एक्सपोर्ट करने वाली कंपनियों को भी भेजा जा रहा है।
अवैध कमेलों में गौवंश कटान की शिकायत पर एक व्यक्ति को जान से हाथ धोना पड़ा। इतना ही नहीं कई बार उस क्षेत्र की जनता में तनाव होते होते बचा है। अवैध पशु कटान से तनाव और पशुओं के खून को भूगर्भ में डालने का मामला कई बार नगर निगम की बोर्ड बैठक में भी उठा। निगम अधिकारियों ने कार्रवाई की भी बात कही। लेकिन स्थिति जस की तस है।
शासन चाहता है अत्याधुनिक कमेला
शासन घोसीपुर में अत्याधुनिक कमेला बनाना चाहता है। इसके लिए पिछले साल नगर निगम को 10 करोड़ रुपये जारी कर दिए थे। हालांकि नगर निगम प्रशासन की लापरवाही के चलते अभी अत्याधुनिक कमेला संचालित होना तो दूर प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी तैयार नहीं हुई है। बताया जा रहा है कि जिस कंपनी को प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनानी है, उसको 20 लाख रुपये जारी कर दिए गए हैं। लेकिन अभी काम नहीं हुआ है।
दूध के गिरते उत्पादन पर गंभीर हो प्रशासन
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष एवं शहर विधायक डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी का कहना है कि शहर के लिए मांस आपूर्ति के हम विरोधी नहीं हैं। कमेले बने तो बने। लेकिन निगम के कमेले से मांस विदेशों में निर्यात नहीं होना चाहिए। साथ ही शासन और प्रशासन को इतना ध्यान जरूर रखना चाहिए कि देश में मांस के शौकीन मात्र 13 प्रतिशत लोग हैं, जबकि बाकी जनसंख्या शाकाहारी है। देश में शत प्रतिशत जनसंख्या दूध पीती है। पशुआें के कटान और मांस के निर्यात से पशुओं की संख्या तो कम हो ही रही है साथ में दूध का उत्पादन गिर रहा है।
कटान होता रहा तो दूध कहां से आएगा
महापौर हरिकांत अहलूवालिया का कहना है कि हम किसी भी कीमत पर पशुओं के कटान से सहमत नहीं हैं। अपने जीते जी पशु कटान का विरोध करता रहूंगा। हमें अपनी नई पीढ़ी के स्वास्थ्य को भी ध्यान में रखना होगा। दूध के गिरते उत्पादन और बढ़ते दामों से स्पष्ट हो रहा है कि महंगाई के कारण आने वाली पीढ़ी को दूध नसीब नहीं होगा।