इलाहाबाद हाईकोर्ट की जनप्रतिनिधियों के लिए गठित विशेष अदालत में सुनवाई से सांसदों और विधायकों की मुश्किलें बढ़ेंगी। पांच साल से जनप्रतिनिधियों के सभी मामले स्थानीय अदालतों में लंबित थे। कई बार कोर्ट में पेश नहीं होने पर नेताओं के खिलाफ एनबीडब्ल्यू वारंट भी जारी हो चुके हैं।
सात सितंबर 2013 में दंगा भड़का और मुजफ्फरनगर और शामली में 65 से ज्यादा बेगुनाहों की मौत हो गई। हिंसा की आग ने बागपत और मेरठ को भी चपेट में ले लिया था। 50 हजार से ज्यादा लोग गांव छोड़ कर शरणार्थी कैंपों में आने को मजबूर हो गए। धार्मिक उन्माद फैलाने, निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने तथा भड़काऊ भाषण देने के जो भी मुकदमे दर्ज किए गए, उनमें भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा के बड़े नेता शामिल हैं। मुख्य मुकदमे खालापार की सभा और नंगला मंदौड़ की पंचायतों के हैं। भाजपा के मौजूदा सांसद डॉ. संजीव बालियान, कुंवर भारतेंद्र सिंह, विधायक उमेश मलिक, विक्रम सैनी, संगीत सोम और विहिप की महिला नेता साध्वी प्राची इन मुकदमों में आरोपी हैं। योगी मंत्रिमंडल में शामिल गन्ना विकास राज्यमंत्री एवं थानाभवन विधायक सुरेश राणा भी दंगे के आरोपी हैं।