पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह किसानों के दिल में बसे हैं। उनकी यादों और बातों का अंतहीन सिलसिला है। किसानों के लिए किए गए कार्यों की बदौलत ही वह किसान मसीहा कहलाते हैं। उनके जाने के बाद किसान राजनीति में आए सूनेपन को कोई दूसरा व्यक्ति आज तक नहीं भर सका।
ग्रामीण जीवन की रखते थे गहरी समझ
चौधरी चरण सिंह किसान राजनीति के क्षितिज्ञ पर लगभग पांच दशक तक छाए रहे। वह कृषि अर्थव्यवस्था की गहरी समझ रखने वाले उच्च कोटि के विद्धान, लेखक एवं अर्थशास्त्री थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी स्वीकार्यता है। उन्होंने गाजियाबाद में वकालत शुरू की और 1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए। महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया और तीन बार कारावास झेला। उन्होंने सरकारी नौकरियों में कृषकों और कृषि मजदूरों के बच्चों के लिए 50 फीसदी आरक्षण की मांग की थी।
- डॉ. शिमला, पूर्व निदेशक लोकसभा
महात्मा गांधी के स्वप्न को बढ़ाया आगे
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहते थे कि भारत का विकास गांव के विकास से जुड़ा है। गांव विकसित होंगे तो देश विकसित होगा। आजादी के बाद चौधरी चरण सिंह ने भी बापू के इसी स्वप्न को आगे बढ़ाने में जीवन समर्पित कर दिया। वह कहते थे कि देश की तरक्की का रास्ता खेतों और खलिहानों से होकर गुजरता है। आजादी के बाद भी ग्रामीणों को कुछ नहीं मिला। आधुनिक सुविधाएं महानगरों के आसपास स्थापित कर दी गई। यही वजह है कि गांव निरंतर पिछड़ते चले गए।
- डॉ. राजकुमार सांगवान, संगठन महामंत्री, राष्ट्रीय लोकदल
हमेशा करते रहे किसानों के हितों की वकालत
ऐसे किसान नेता जिन्होंने 1952 में कृषि एवं राजस्व मंत्री बनने के बाद जमीदारी खात्मा अधिनियम, चकबंदी कानून बनाया। 1954 में भूमि संरक्षण कानून बनाया। तीन अप्रैल 1969 को प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने पर छह एकड़ तक के किसानों का लगान आधा किया और खाद से बिक्री कर लगान समाप्त किया।
- राजपाल सिंह एडवोकेट, जिलाध्यक्ष, सपा
चौधरी साहब ने पढ़ाया अनुशासन का पाठ
छपरौली विस से पांच बार विधायक रहे चौधरी नरेंद्र सिंह बताते है कि 1952 में चौधरी साहब पहली बार कैबिनेट मंत्री बने थे। वह अपने साथी रमाला निवासी केदारनाथ सिंह और कासिमपुर खेड़ी निवासी अजब सिंह के साथ चौधरी साहब से मिलने लखनऊ पहुंचे। चौधरी साहब सुबह करीब साढ़े नौ बजे अपने बंगले से सचिवालय जाने के लिए निकल रहे थे। मुलाकात के दौरान ठंड की वजह से मैंने अपनी पेंट की जेब में हाथ डाल रखे थे। इस पर उन्होंने मुझसे कहा था कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एटीट्यूड नहीं पढ़ाया जाता क्या? मैं कुछ समझ पाता, इससे पहले ही वह बोले कि जब सामने उम्र में बड़ा आदमी बात कर रहा हो तो, जेब में हाथ डालकर खड़े रहना अशिष्टता होती है।
राजनारायण मेहमान है, पहले नामांकन करने दें
समाजवादी नेता राजनारायण चौधरी साहब के अच्छे मित्र थे। लेकिन 1979 में दोनों की राह जुदा हो गई। लोकसभा चुनाव में राजनारायण ने चौधरी साहब की बागपत लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया। संयोग से दोनों एक ही दिन नामांकन करने पहुंचे थे। डर था कि कहीं दोनों नेताओं के समर्थक आपस में न भिड़ जाए। ऐसे में चौधरी साहब ने अपने समर्थकों से कहा कि राजनारायण हमारे मेहमान है, इन्हें पहले नामांकन करने दे।