था भरा सोना लंका की दीवार में, एक रत्ती न मिला रावण को मरते बार में...। ऐसे शब्दों के साथ कथावाचक अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने कहा कि मानव को धन आदि का लोभ नहीं करना चाहिए। धन से बड़ा धर्म होता है। धन तो पापी भी कमा लेता है, लेकिन धन के लिए धर्म मत बिगाड़ो। बेटों को धर्मवान बनाओ। प्राण चले जाएं, पर धर्म न जाए। यदि पुत्र हैं तो पुत्र धर्म का पालन करें। मेहमान, स्त्री, पुरुष, राजा सभी काे अपने-अपने धर्म का पालन करना चाहिए। धर्म को जानने के लिए सत्संग की आवश्यकता है।
अनिरुद्धाचार्य ने शुक्रवार को भैसाली मैदान में दूसरे दिन की कथा में यह बात कही। बृहस्पतिवार को हुए बारिश से जलमग्न इस मैदान में दूसरे दिन भी नियत समय पर कथा शुरू हुई। दूसरे दिन भक्तों की संख्या पहले दिन के मुकाबले दोगुना रही। महाराज श्री ने कहा कि सत्संग में मनुष्य को पूर्ण कर दिया जाता है। हर स्थान पर धर्म अलग हैं। कसाई के सामने सच बोलकर गाय का पता बताया तो पाप के हकदार बनोगे। कसाई अगर गाय को ढूंढ रहा है तो झूठ मत बोलो, लेकिन मौन हो जाओ। सामान्य जिंदगी में सदा सत्य मार्ग पर ही चलना चाहिए। दया धर्म का मूल है।