मेडिकल कॉलेज के प्राइवेट वार्ड साल 1978 में बने थे। मेडिकल कॉलेज का स्टाफ चाहता था कि उनकी जगह यहां अलग से स्टाफ उपलब्ध कराया जाए। स्टाफ की ड्यूटी में आनाकानी की वजह से धीरे-धीरे यहां अव्यवस्था फैलती गई और साल 1992 में ये वार्ड पूरी तरह से बंद हो गए।
मेडिकल प्रशासन भी चाहता था कि इसके लिए अलग से स्टाफ की व्यवस्था की जाए। इसके लिए कोशिशें भी की गईं, मगर ऐसा नहीं हो सका। न तो वार्ड के लिए अलग से स्टाफ मिला और न ही इसके लिए शासन से अलग से बजट आया। इस बीच इनका जीर्णोद्धार भी कराया गया। अब इनमें से दो वार्डों को ऑफिस बना दिया गया, जबकि बाकी बंद पड़े हैं।
स्टाफ मिल जाएगा तो वार्ड शुरू हो जाएंगे
स्टाफ की कमी के कारण प्राइवेट वार्डों को फिर शुरू नहीं किया जा सका है। शासन से स्टाफ की मांग की गई है। अगर मांग पूरी हो जाती है तो वार्डों को शुरू किया जाएगा। यहां कुछ असमाजिक गतिविधियां भी होती थीं, लिहाजा यहां सुरक्षा व्यवस्था की भी जरूरत पड़ेगी। - डॉ कौशलेंद्र सिंह, चिकित्सा अधीक्षक, जिला अस्पताल
जरूरत पड़ने पर करते हैं इस्तेमाल
स्टाफ की कमी के कारण प्राइवेट वार्ड शुरू नहीं हो सके हैं। अनुरक्षण बजट में से कुछ पैसा इन्हें दुरुस्त करने में लगाया गया है। कुछ वार्डों को ठीक कराया गया है, ताकि जरूरत पड़ने पर इनका इस्तेमाल किया जा सके। कोरोना काल में कई वार्ड इस्तेमाल किए गए थे। - डॉ. आरसी गुप्ता, प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज