ये हैं सहारनपुर के मुद्दे
-- शिक्षा -- उच्च शिक्षा के लिहाज से सहारनपुर पिछड़ा हुआ है। युवाओं को उच्च शिक्षा के लिए हरियाणा, उत्तराखंड के अलावा मेरठ या दिल्ली का रुख करना पड़ता है। हर साल 25 से 30 हजार अभ्यर्थी ऐसे होते हैं, जिन्हें उच्च शिक्षा के लिए जिले से बाहर जाना पड़ता है। यूनिवर्सिटी स्थापना की मंजूरी प्रदेश सरकार ने दे दी और पुंवारका राजकीय महाविद्यालय का चयन भी हो गया, लेकिन आचार संहिता लगने के कारण इसका संचालन नहीं हो सका।
-- स्वास्थ्य -- पिलखनी में राजकीय मेडिकल कॉलेज तो हैं, लेकिन स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर न होने और संसाधनों का अभाव होने के कारण गंभीर मरीज को रेफर कर दिया जाता है। स्वाइन फ्लू सहित कई गंभीर बीमारियों की जांच की व्यवस्था तक नहीं है।
-- यातायात व्यवस्था -- शहर में यातायात व्यवस्था लचर है। तीन प्रमुख हाईवे शहर के बीच से गुजर रहे हैं, जिस कारण भारी वाहनों की आवाजाही से शहर जाम में जकड़ा रहता है। ट्रैफिक जाम इस शहर की सबसे बड़ी समस्या है। करीब एक साल से बाईपास का निर्माण चल रहा है, लेकिन अभी पूर्ण नहीं हो पाया है।
-- गन्ना मूल्य भुगतान -- जिले के गन्ना किसानों का करीब 577 करोड़ रुपये गन्ना मूल्य चीनी मिलों पर बकाया है। प्रदेश सरकार की तरफ से अक्सर बकाया भुगतान को लेकर सख्त निर्देश दिए जाते रहे, लेकिन मनमानी कर रहे मिल प्रबंधन भुगतान नहीं करते हैं।
-- सड़क --- अंबाला सहारनपुर हाईवे की हालत खराब है। दिल्ली सहारनपुर हाईवे का शिलान्यास तो हो गया, लेकिन निर्माण शुरू नहीं हुआ।
-- वुड कार्विंग कारोबार -- सहारनपुर की पहचान वुड कार्विंग के लिए दुनियाभर में है, लेकिन सुविधाओं के अभाव में यह परेशानी के दौर से गुजर रहा है। लकड़ी का डिपो बनवाने सहित विभिन्न मांगें वुड कार्विंग कारोबार से जुड़े लोगों की हैं।
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