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सौ वर्ष की यात्रा में संघ ने प्रतिबंध-झूठी हत्याओं के आरोप और अत्यंत अभाव झेला : मोहन भागवत

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माधवकुंज में प्रमुख जन गोष्ठी में उपस्थित प्रमुख जन। स्रोत : आरएसएस।
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मेरठ। आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने शनिवार को कहा कि सौ वर्ष की यात्रा में संघ ने बहुत कुछ झेला है। प्रतिबंध, झूठी हत्याओं के आरोप, राजनीतिक विरोध के साथ अत्यंत अभाव भी झेलना पड़ा। स्वयंसेवकों की हत्याएं भी हुईं, लेकिन दृढ़ संकल्प, असीम इच्छाशक्ति के चलते अपने आपको बचाते हुए आज हम अनुकूलता के काल में आए हैं। एक प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा कि 40 हजार वर्ष से सभी भारतीयों का डीएनए एक ही है। स्वेच्छा से हिंदू धर्म में घर वापसी करने वालों का स्वागत करना चाहिए।
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माधवकुंज में प्रमुख जन गोष्ठी में सर संघ चालक ने कहा कि विविधता हमारे देश का स्वभाव रहा है, लेकिन हम एक साथ मिलकर एक राष्ट्र में रह रहे हैं। हमारे पूर्वज जानते थे कि बाहर सुख मिलता नहीं, अंदर किसी ने खोजा नहीं। इसीलिए आध्यात्मिक रूप से उन्होंने इस तत्व को समझा और अपने देश के विषय में कहा कि विविधता मिथ्या है और एकता सत्य है। सर संघ चालक ने कहा कि हिंदू समाज को संगठित करने की कार्यपद्धति ही आरएसएस है। छलकपट, लालच, धोखाधडी, भय से मतांतरण नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश को कमजोर करने वाले बाहरी हमलों को रोकने के लिए सभी को एकजुट होना पड़ेगा।
संघ जैसा कोई दूसरा है ही नहीं
सर संघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि संघ की तुलना किसी से नहीं हो सकती। क्योंकि संघ जैसा कोई दूसरा है ही नहीं। संघ की शाखा एवं संचलन को देखकर कोई सोचता है कि संघ कोई पैरा मिलिट्री संगठन है, लेकिन ऐसा नहीं है। संघ व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला है। शाखा में व्यक्ति के हर पक्ष के विकास और निर्माण की प्रक्रिया को मूर्त रूप दिया जाता है।
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अपने स्व: को भूलने के कारण हम बंटे
उन्होंने कहा कि अक्सर चिंतन किया जाता है कि हम बार-बार पराधीन क्यों हो रहे हैं? हम अपने स्व: को भूलने के कारण बंट गए। इससे अनेक कुरीतियां आईं और कई असमानताएं समाज में व्याप्त हुईं। उन्होंने कहा कि समरस, संगठित, अनुशासित हिंदू समाज का संगठन ही सभी समस्याओं का समाधान है। भारत में जो भी निवास करता है वह हिंदू है। हमारे मत, पंथ, पूजा पद्धति अलग हो सकती है, लेकिन हम सब हिंदू ही है। हिंदू एक विशेषण है। इसका मतलब जोड़ना, सबके हित के विषय में सोचना और सबके कल्याण की कामना करना है। 200 वर्षों में भारत में इतने महापुरुष हुए हैं, उतने दुनिया के किसी भी देश में नहीं हुए। यह हमारे लिए प्रेरणा का विषय है।

संघ प्रमुख ने दोहराया, सभी भारतीयों का डीएनए एक
जिज्ञासा समाधान सत्र में डाॅ. मोहन भागवत ने पूछे गए प्रश्नों के खुलकर उत्तर दिए। एक प्रश्न के जवाब में उन्होंने फिर कहा कि भारतीय उप महाद्वीप में रहने वाले सभी हिंदू थे। इसलिए 40 हजार वर्ष से सभी भारतीयों का डीएनए एक ही है। हम जातिवाद के जाल में उलझे हैं, जाति है कि जाती ही नहीं। शिक्षा पर बजट बहुत कम है, शिक्षा सबके लिए सुलभ कैसे हो सकती है? इस प्रश्न पर भागवत ने कहा कि बजट बढ़ाने का काम सरकार का है, लेकिन संघ का मत है कि शिक्षा सभी के लिए सुलभ हो। प्राचीन काल में भी आप देखते हैं कि समाज के सहयोग से अनेक विद्यालय चलते थे, आज भी हमें वैसे ही परस्पर सहयोग और संस्कार की आवश्यकता है। समाज बिना सरकारी सहायता के वंचितों को शिक्षित करे। एक राष्ट्र-एक शिक्षा तथा एक राष्ट्र-एक स्वास्थ्य नीति की आवश्यकता के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि एक शिक्षा नीति है, एक स्वास्थ्य नीति भी है। इसमें क्षेत्रीय आवश्यकताओं को देखते हुए कुछ विषय जोड़ने की भी छूट है, लेकिन इसे लागू करना राज्यों का विषय है। आदर्श मूल्यों के क्षरण पर उन्होंने कहा कि सबसे पहले मूल्य आधारित शिक्षा लागू करनी होगी। समाज को संस्कारयुक्त वातावरण देना होगा। समृद्ध होना अच्छी बात है। वेदों में कहा गया है कि आप भरपूर कमाएं, लेकिन अपनी जरूरत के हिसाब से रखते हुए शेष समाज हित में प्रयोग करें।
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