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हिंदी हैं हम: अमेरिका में बड़ा योगदान देने वाले वटुक बोले, नौकरी, व्यापार और सत्ता की भाषा बने हिंदी

Mon, 23 Aug 2021 07:37 PM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ

सार

हिंदी के उत्थान के लिए किए गए कार्यों के लिए वेद प्रकाश वटुक को जोहानिसबर्ग में 2012 में सम्मानित किया गया।
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वेद प्रकाश वटुक। - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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अमेरिका में हिंदी साहित्य को स्थापित करने में बड़ा योगदान देने के साथ ही वेद प्रकाश वटुक भाषा और लोक साहित्य पर अनेक पुस्तकों का लेखन और संपादन कर चुके हैं। मूल रूप से बड़ौत क्षेत्र के फजलपुर गांव निवासी वटुक ने मेरठ कॉलेज से स्नातकोत्तर के बाद हार्वर्ड विश्वविद्यालय से संस्कृत और ओल्ड चर्च स्लावॉनिक भाषा के तुलनात्मक अध्ययन पर डी-लिट की उपाधि प्राप्त की। हिंदी के उत्थान के लिए किए गए कार्यों के लिए उन्हें जोहानिसबर्ग में 2012 में सम्मानित किया गया। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने भी प्रथम प्रवासी भारतीय हिंदी भूषण सम्मान से विभूषित किया। हिंदी हैं हम के तहत वेद प्रकाश वटुक से हिंदी के प्रचार प्रसार पर एक बातचीत....

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प्रश्न : हिंदी अपना गौरव कैसे प्राप्त करें?
उत्तर : हिंदी संविधान द्वारा स्वीकृत राजभाषा है। हालांकि व्यवहार में अभी तक यह न राजभाषा हुई है और न ही पूरी तरह संपर्क भाषा है। हिंदी की राजनीति करने वाले बड़े लोग अंग्रेजी के ही पक्षधर हैं। वे अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में पढ़ाते हैं। नौकरी, व्यापार और सत्ता की भाषा बनने से हिंदी का प्रसार हो सकता है। 

प्रश्न : व्यवस्था में कहां चूक हो रही?
उत्तर : विदेशी दिमाग और देसी मन सहज रूप से एक दूसरे में समन्वय नहीं बिठा पा रहा है। हम सामंतवादी युग में जी रहे हैं। बेटी को राष्ट्रपति चुनने का अधिकार है तो पति चुनने का भी अधिकार मिलना चाहिए। महात्मा गांधी में हिंदी के प्रति निष्ठा थी। टर्की में संपूर्ण सरकारी और गैरसरकारी कार्य टर्किश भाषा में होता है। चीन के आजाद होने पर विदेश मंत्री ने जब अपनी भाषा में भाषण दिया तो कई देशों के राजदूत उसे समझ नहीं पाए। विदेश मंत्री ने कहा कि चीन में अगर रहना है तो चीन की भाषा को लिखना और समझना होगा। 
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प्रश्न : हिंदी साहित्य की समाज में क्या भूमिका रही?
उत्तर : ऐतिहासिक दृष्टि से हिंदी संघर्ष और निर्माण की भाषा है। संतों और कवियों ने समाज सुधार के लिए आवाज बुलंद की। आजादी के बाद हिंदी के कुछ साहित्यकार सत्ता के आश्रित हो गए। निर्भीक होकर सत्ता को सत्यमार्ग दिखाने का कार्य साहित्यकार ही करते हैं। कबीर और निराला की तरह हिंदी और साहित्य के विकास के लिए दोबारा भूमि तैयार करने की जरूरत है।

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प्रश्न : आपको विदेश जाने की जरूरत क्यों पड़ी?
उत्तर : मेरठ कॉलेज से एमए की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद सोचा कि क्या करना चाहिए। कक्षा सात में राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक ‘अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा’ पढ़ी थी। गांव के सरल हृदय जमींदार ने मदद की। ब्रिटेन जाने का रास्ता साफ हो गया। लंदन में श्रम और पढ़ाई दोनों साथ-साथ की। हार्वर्ड विश्वविद्यालय में रूसी भाषा पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति मिली। इसके बाद कई विश्वविद्यालयों में भारतीय संस्कृति, हिंदी, रूसी के साथ भारतीय इतिहास राजनीति का अध्यापन किया। प्रवासी भारतीयों पर शोध किया। 

वटुक के प्रमुख प्रकाशित काव्य ग्रंथ एवं अन्य रचनाएं
त्रिविधा, बंधन अपने, देश पाराया, कैदी भाई बंदी देश, आपात शतक, नीलकंठ बन न सका, एक बूंद और, कल्पना के पंख पाकर, रात का अकेला सफर, नये अभिलेख का सूरज, बांहों में लिपटी दूरियां, सहस्रबाहु, अनुगूंज, इतिहास की चीख, बाहुबली, उत्तर रामकथा, अभिशप्त द्वापर, मानवता का अरण्य रोदन, और ईसा मरता रहा के साथ गद्य में हिंदी-हिंदी कितना जानी, अनलिखा रह गया इतिहास, गदर पार्टी का इतिहास, मेरी इसराइल डायरी, शहीद न होने का दुख।
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