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बदलते दौर के साथ बदला हरियाली तीज का रंग, महिलाएं बोलीं आधुनिकता ने फीके किए त्योहार

Sat, 03 Aug 2019 05:45 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बागपत
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hariyali teej, aprajita - फोटो : अमर उजाला
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समय बदल रहा है। तीज के त्योहार पर भी बदलाव का असर साफ दिखता है। अब न तो महिलाओं की मंडलियां गीत गुनगुनाती नजर आती हैं और न ही झूले पड़ते हैं। कभी तीज का त्योहार दस दिन तक उत्सव के तौर पर मनाया जाता था।

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सावन के महीने में तीज का खास महत्व है। क्योंकि तीज के बाद त्योहार शुरू होते हैं। महिलाएं तीज की तैयारियां एक-एक महीना पहले शुरू करती थी। घर में पकवान बनाने से लेकर सिंधारा देने की तैयारी होती थी। खासकर नई नवेली दुल्हन के लिए यह त्योहार खास होता था। दस दिन पहले से ही झूला झूलना महिलाएं शुरू कर देती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं होता।

hariyali teej, aprajita - फोटो : अमर उजाला
देहात में भी नहीं पड़ते झूले
शहर क्या अब देहात में भी झूले नहीं पड़ते। ग्रामीण महिलाएं न तो झूले पर झूलती नजर आती हैं और न ही गीत गुनगुनाती नजर आती है।

hariyali teej, aprajita - फोटो : अमर उजाला
बाजार में सजा घेवर, चहल पहल
बाजार में तीज की पर अलग ही रौनक नजर आई। दुकानों पर घेवर सजा रहा। लोगों ने खरीदारी की। इसके अलावा उपहार की दुकानों पर भी भीड़ देखने को मिली।

hariyali teej, aprajita - फोटो : अमर उजाला
अब कहां सुनाई पड़ रहे सावन के गीत...
आधुनिकता के चलते त्योहार भी फीके पड़ गए हैं। पेड़ों पर झूले नहीं पड़ते। सावन के गीत भी अब कम ही सुनाई पड़ते है। बुजुर्ग लोग अभी परंपराओं को बनाए रखे हुए है, लेकिन नवयुवक सांस्कृतिक और परंपराओं से दूर भाग रहे हैं। जिस कारण त्योहार का रस खत्म हो गया है। पुराने समय के त्योहार और अब में जमीन-आसमान का अंतर हो गया है।

hariyali teej, aprajita - फोटो : अमर उजाला
शहर के आर्य नगर मोहल्ला निवासी मंजू शर्मा ने कहा कि पहले के त्योहार एक साथ मिलकर मनाए जाते हैं, जिससे मन लगता था। अब जमाने के साथ परंपराए ही बदल गई हैं। पेड़ों से झुले गायब हो गए हैं। 

hariyali teej, aprajita - फोटो : अमर उजाला
बबिता चौधरी ने कहा कि पहले हम महिलाएं एक साथ गीत गाती थी अब गीत सुनने बरसों बीत गए है। पुरानी याद केवल त्योहारों पर ही याद आती है। कोई भी एक साथ बैठने को अब तैयार नहीं है। मोबाइल ने त्योहार फीके कर दिए। 
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नूपुर शर्मा ने कहा कि तीज का पर्व उल्लास ओर उमंग भरा होता है। इसमें सावन के गीत गाकर अपनी परंपराओं को आगे बढ़ाएंगे। सभी को साथ लेकर झूला झूलेंगे। मेघा शर्मा ने कहा कि झूले का सावन के गीत गाते समय बहुत मन लगता था। मोहल्लों की महिलाएं इकट्ठी होकर तीज का त्योहार मनाती थी। वह अपने परिवार के साथ इस त्योहार को मना रहे है।
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