2005 में रश्मि आर्य ने गांव के एक छोटे से घर से इसकी शुरुआत की थी। गुरुकुल के प्रचार में रहने के कारण बच्चों को पढ़ाने में परेशानी होती थी। तब गुलशन और उसकी बहन इस मुहिम में रश्मि के साथ आईं। गुलशन उस वक्त दसवीं की छात्रा थी। उसने खुद को गुरुकुल को समर्पित कर दिया। उसे लगा, उसकी यहां ज्यादा जरूरत है। इसलिए गुरुकुल में पढ़ाते हुए अपनी शिक्षा पूरी की। तब से वह रश्मि आर्य के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बेटियों को सशक्त बनाने का काम कर रही है।
एमबीए, एलएलबी कर चुकी गुलशन कहती है, मुझे बचपन से समाज सेवा में रुचि थी। मैंने सोचा जब दीदी बाहर से आकर हमारे क्षेत्र की बेटियों को शिक्षित कर रही हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकती। मेरे पिता ने इस कदम में पूरा साथ दिया। परिवार ने बहुत कुछ झेला। बहनों की शादी में दिक्कत आई।