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मजहब की दीवारें तोड़ गुरुकुल की नई उम्मीद बन गईं 'गुलशन', ऐसे पूरा किया बचपन का सपना

Sat, 14 Dec 2019 11:22 AM IST
कपिल kapil रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ
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गुरुकुल में पढ़ाती हैं गुलशन - फोटो : अमर उजाला
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गुलशन आज भी कट्टरपंथियों के निशाने पर रहती है। लोगों का सवाल यही है, गुलशन गुरुकुल में क्यों है? तमाम बाधाओं के बावजूद गुलशन नहीं मुरझाई। उसका मकसद इस संकीर्ण मानसिकता से बहुत ऊपर है। गुलशन का परिवार उसकी ढाल बनकर खड़ा है... आगे देखें आखिर कैसे मजहब की दीवार तोड़कर समाज में एक मिसाल कायम कर रही हैं 'गुलशन' -
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गुरुकुल की छात्राएं - फोटो : अमर उजाला
बेटियां किसी भी धर्म की हो, उनके प्रति समाज की धारणा एक सी है। गुलशन ने जब अपने चारों ओर देखा तो बेटियों को बंदिशों में ही पाया। बचपन से उसके अंदर समाज के लिए कुछ करने का जज्बा था। जब रश्मि ने बाहर से आकर गुलशन के गांव में बेटियों की शिक्षा की अलख जगाई तो उसे भी राह मिल गई। मजहब की दीवारों को तोड़कर गुलशन कन्या गुरुकुल की नई उम्मीद बन गई। उसने ममत्व से इस आंगन को सींचा और बच्चियों को शिक्षा दी। गुरुकुल के संचालन में रश्मि का हाथ बंटाया। निःशुल्क सेवा के सफर को 14 साल हो चुके हैं।  

नारंगपुर का श्रीमद् दयानंद उत्कर्ष आर्ष कन्या गुरुकुल इस नजर से भी बहुत मायने रखता है। वह धर्म, जाति के बंधनों से परे है। वहां आजाद ख्यालों का गुलशन भी खिलता है।
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गुरुकुल की छात्रा - फोटो : अमर उजाला
2005 में रश्मि आर्य ने गांव के एक छोटे से घर से इसकी शुरुआत की थी। गुरुकुल के प्रचार में रहने के कारण बच्चों को पढ़ाने में परेशानी होती थी। तब गुलशन और उसकी बहन इस मुहिम में रश्मि के साथ आईं। गुलशन उस वक्त दसवीं की छात्रा थी। उसने खुद को गुरुकुल को समर्पित कर दिया। उसे लगा, उसकी यहां ज्यादा जरूरत है। इसलिए गुरुकुल में पढ़ाते हुए अपनी शिक्षा पूरी की। तब से वह रश्मि आर्य के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बेटियों को सशक्त बनाने का काम कर रही है।

एमबीए, एलएलबी कर चुकी गुलशन कहती है, मुझे बचपन से समाज सेवा में रुचि थी। मैंने सोचा जब दीदी बाहर से आकर हमारे क्षेत्र की बेटियों को शिक्षित कर रही हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकती। मेरे पिता ने इस कदम में पूरा साथ दिया। परिवार ने बहुत कुछ झेला। बहनों की शादी में दिक्कत आई।
 

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गुरुकुल की संचालक रश्मि आर्य - फोटो : अमर उजाला
हिंदू और मुस्लिम दोनों को मुझसे दिक्कत होती है। मैं कहती हूं, मैंने गुरुकुल को अपने 14 साल दिए हैं। मैं यहां आना छोड़ दूंगी लेकिन क्या आप लोग इस सेवा को करेंगे? तब लोग शांत हो जाते हैं। गुरुकुल मेरा दूसरा घर है। बच्चियां मुझसे बहुत घुली-मिली हैं। लड़कियों को पढ़ाने से लेकर उनके लिए भोजन आदि की व्यवस्था करने में दीदी का हाथ बंटाती हूं। मुझे अच्छा लगता है कि मैं कुछ सार्थक कर रही हूं।

गुरुकुल की संचालक रश्मि आर्य ने बताया, मेरे बाद यहां की सारी जिम्मेदारी गुलशन संभालती है। लोग उसे कहते हैं, तू हिंदू बन गई पर उसे इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। उसे इस सेवा में आनंद आता है। 13-14 साल से वह हमारे साथ जुड़ी है।
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शांति यज्ञ में भी जाती हैं यहां की बेटियां - फोटो : अमर उजाला
विवाह संपन्न कराती हैं बेटियां
गुलशन बताती है, पहले गांव की चार-पांच लड़कियां गुरुकुल में शिक्षा लेने आती थीं। समय के साथ लोगों की सोच बदली है। नारंगपुर व आसपास के लोग नवरात्रि में गुरुकुल की लड़कियों को हवन कराने के लिए बुलाते हैं। यहां की बेटियां शांति यज्ञ में भी जाती हैं। लोग विवाह में मंत्रोच्चारण के लिए भी उन्हें बुलाने लगे हैं। गुरुकुल को लेकर लोगों की धारणा बदली है। पहले एक कटोरा नाज भी नहीं देते थे। गुरुकुल की लड़कियां खेलों में भी अपनी प्रतिभा दिखा रही हैं।

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