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इस मजार पर मोहब्बत के चिराग जलाते हैं हिंदू-मुस्लिम, एकता की मिसाल है मिट्ठा पीर गली

Fri, 13 Dec 2019 05:02 PM IST
कपिल kapil रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ
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मजार - फोटो : अमर उजाला
जिन्हें जीते जी हिंदुओं ने अपनी बिरादरी से अलग कर दिया, वह मरने के बाद धार्मिक संकीर्णता से परे होकर पूजनीय हो गए। उनकी मजार पर हिंदू-मुस्लिम दोनों दीप जलाते हैं। दोनों उनकी मजार की देख रेख करते हैं... 
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मंदिर - फोटो : अमर उजाला
मेरठ में बजाजा बाजार इलाके की एक गली में मजहबों से परे मोहब्बत के चिराग जलते हैं। इसकी पहचान उसी से है। मिट्ठा पीर एक नाम नहीं, इंसानियत की मिठास है। उनके नाम का मंदिर और मजार आमने-सामने हैं।
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मनोज कुमार - फोटो : अमर उजाला
लोग मंदिर में पूजा करते हैं और मजार में दीपक जलाते हैं। मिट्ठा पीर की कहानी को पुरानी पीढ़ी ने अपने कंठों में पाला-पोसा। उनसे होते हुए वह अगली पीढ़ी तक पहुंची। उसने हमें सुनाई। नवाब की दावत में मांस खाने पर बिरादरी से अलग किए गए वैद्य मिट्ठनलाल शर्मा परिवार के साथ यहां चले आए। मौत के बाद उन्हें दफनाया गया। लोगों ने उनकी मजार बना दी। तब से वह पीर मिट्ठा कहलाए और सबके लिए पूजनीय बन गए। 

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मोहम्मद सुहैल - फोटो : अमर उजाला
उनके द्वारा स्थापित मंदिर मिट्ठा पीर के नाम से जाना जाता है। लोग मंदिर और मजार दोनों पर अपनी आस्था लुटाते हैं। यह गली पीर मिट्ठा कहलाती है। कुछ कदम चलकर आमने सामने मिट्ठा पीर का मंदिर और मजार हैं। मंदिर में शिवलिंग, हनुमान जी व राधा कृष्ण आदि की मूर्तियां स्थापित हैं। संकरी गली के अंदर जाकर मिट्ठा पीर की मजार है।
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सुनील गुप्ता - फोटो : अमर उजाला
69 वर्षीय अखिलेश शर्मा बताते हैं, अपने दादा जी से पीर मिट्ठा की कहानी सुनी। उनका नाम मिट्ठनलाल शर्मा था। वह गाजियाबाद के वैद्य थे। उन्होंने नवाब का इलाज किया। खुश होकर नवाब ने उन्हें दावत में बुलाया। वहां उन्होंने मांस खा लिया जिसके बाद उन्हें बिरादरी से अलग कर दिया गया। इस बात को पीढ़ियां बीत गईं। उनकी पत्नी ने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। मजार बनने के बाद वह मिट्ठा पीर हो गए। पीर साहब हमारे बुजुर्ग हैं। कहते हैं कि मजार पर बीमारी से जुड़ी मनोकामना मांगने पर पूरी हो जाती है।
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यहां कोई भेदभाव नहीं 

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सुरेश - फोटो : अमर उजाला
गली में मोहम्मद सुहैल की दुकान है। वह भी मजार की साफ-सफाई करते हैं। वहां धूप भी जलाते हैं। कहते हैं, यहां कोई भेदभाव नहीं है।

सुनील गुप्ता कहते हैं, बचपन से मंदिर और मजार को ऐसे ही देखा। शनिवार को भैरों बाबा के मंदिर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं। उनमें से कई लोग मजार पर आकर दीप जलाते हैं।

मनोज कुमार की गजक की दुकान है। कहते हैं, सीजन में जो भी नई चीज बनाते हैं, पीर मिट्ठा के मंदिर और मजार पर चढ़ाते हैं। हमारी दुकान 100 साल पुरानी है। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।
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उषा - फोटो : अमर उजाला
मंदिर की देखरेख करने वाले सुरेश चंद्र शर्मा ने बताया, जो मंदिर में हाथ जोड़ता है, वह मजार को भी नमन करता है। मंदिर क्षतिग्रस्त हो गया था। 80 के दशक में इसका जीर्णोद्धार हुआ।

उषा रानी कहती हैं, जब भी मंदिर में भंडारा होता है तो देवताओं को प्रसाद अर्पित करने के बाद मजार पर भोग लगाते हैं। मिट्ठा पीर की मान्यता बहुत है।

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