कादराबाद। देश के बंटवारे के बाद 1955-56 में बसाई गई भूतपूर्व सैनिक कॉलोनियों में निवास कर रहे सैकड़ों भूतपूर्व सैनिकों में आज भी जंग लड़ने जज्बा लिए हैं। इनमें से बहुत से पूर्व सैनिकों ने 1962 तथा 1971 में भारत-पाकिस्तान के युद्ध में भाग लिया।
सेवानिवृत कैप्टन भूपेंद्र सिंह रावत (80) ने बताया कि उस समय आमने-सामने की लड़ाई होती थी। दुश्मन को सामने जाकर मारना होता था। पहले मोर्टार से लड़ा जाता था। अब हमारे पास आधुनिक हथियारों सहित परमाणु सुविधा व रडार हैं। दूर से मिसाइलों से हमला कर शत्रु को नेस्तनाबूद कर दिया जाता है। भूपेंद्र सिंह के पिता भी फौज में ट्रेनर रहे हैं। वहीं उनके पुत्र व पौत्र भी सेना में हैं।
सेवानिवृत सूबेदार मदन सिंह रावत (83) का कहना है कि उन्होंने पाकिस्तान से हुए तीनों युद्ध में भाग लिया था। उस दौरान अन्न बचाने के लिए सोमवार का व्रत रखा जाता था। राजस्थान में ड्यूटी के दौरान तालाब से पानी मिलता था। सेना को मारने के लिए उसमें भी जहर घोल दिया गया था। युद्ध के लिए मुठभेड़ कर तलवार व चाकू से हमले होते थे। उनके बेटे भी देश सेवा में लगे है ।
महाराज सिंह रावत ने 1965 व 1971 की लड़ाई लड़ी थी। तब बैनेट, हथगोले से मुठभेड़ कर युद्ध होता था। सेना को अपने लिए रास्ते, पुल तैयार कर फील्ड बनाना होता था। वहीं, शत्रु के फील्ड को तलाश कर नष्ट करना होता था। उनका पुत्र हवलदार से सेवानिवृत्त होने के बाद डीएससी लेह में तैनात है।
बालम सिंह बिष्ट के अनुसार वह देश की सेवा को आज भी सेना में जाने को तैयार हैं। उनका कहना है कि आज की लड़ाई बहुत आसान है। पाकिस्तान भारत के सामने कोई मायने नहीं रखता। वह केवल नीचता पर अडिग है। हमारे सैनिक हथियारों व जंगी बेड़ों से करारा जवाब दे रहे हैं।