अजित सिंह की गैर मौजूदगी में जयंत की परीक्षा
हाल के लोकसभा चुनावों में चौधरी अजित सिंह के बिना यह पहला लोकसभा चुनाव होगा। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में अजित सिंह की पार्टी आरएलडी हाशिए पर थी। 2020 में अजित सिंह के निधन के बाद पहला चुनाव 2022 का विधानसभा चुनाव हुआ, जिसमें रालोद मुखिया जयंत चौधरी ने सपा के साथ गठबंधन किया और पश्चिमी यूपी में 9 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल कर ली।
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद यह पहला चुनाव था जिसमें भाजपा को कई सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था। पश्चिम में रालोद को संजीवनी मिली तो भाजपा की चिंता बढ़ना स्वाभाविक था। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जयंत चौधरी का दिल जीत लिया। कुछ दिन पहले तक रालोद इंडिया गठबंधन का हिस्सा था और सपा के साथ उसकी सीट शेयरिंग भी हो चुकी थी। सपा ने रालोद को 7 सीटें दी थीं, लेकिन जयंत ने इंडिया गठबंधन छोड़ एनडीए गठबंधन के साथ जाना बेहतर समझा।
सपा-बसपा गठबंधन ने पश्चिम की सात सीटों पर किया था कब्जा
2019 के चुनाव में सपा और बसपा ने पश्चिमी यूपी की सात सीटों पर कब्जा किया था। इसमें सपा ने रामपुर, मुरादाबाद, संभल सीट जीती थी जबकि बसपा ने सहारनपुर, बिजनौर, नगीना और अमरोहा सीट पर फतह हासिल की थी।
2014 के चुनाव में यह सभी सीटें मोदी लहर में भाजपा के खाते में गई थीं। इस बार सपा-बसपा का गठबंधन नहीं हैं तो भाजपा इसका लाभ लेने की पूरी कोशिश करेगी और दोबारा इन सीटों पर अपना कब्ज़ा जमाना चाहेगी। 2014 के चुनाव में यह सभी सीटें भाजपा के खाते में गई थीं।
इन सीटों पर कम मार्जिन से हुआ था हार जीत का फैसला
2019 के चुनाव में मेरठ और मुजफ्फरनगर ऐसी सीट थी जहां फैसला कम वोटों के अंतर से हुआ था। मुजफ्फरनगर में भाजपा के संजीव बालियान ने रालोद के अजित सिंह को 6526 वोटों से हराया था। वहीं मेरठ सीट को भाजपा ने बसपा के याकूब कुरैशी से 4707 वोटों के अंतर से जीती थी। भाजपा की कोशिश इस चुनाव में इन सीटों पर जीत के अंतर को बढ़ाने की होगी वहीं सपा-कांग्रेस इस सीट को अपनी झोली में करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेंगी।
हर बार अपना सांसद बदल देती है कैराना की जनता
एक सीट कैराना की भी है जिसे विपक्षी गठबंधन अपने पक्ष में करने की पूरी कोशिश करेगा। क्योंकि कैराना का मिजाज कुछ ऐसा है कि वह हर नया सांसद चुनता है। 2009 में बसपा से तबस्सुम हसन सांसद बनी थीं।
2014 में भाजपा ने यह सीट जीत ली और हुकुम सिंह सांसद बने। हुकुम सिंह का 2018 में निधन हो गया तो यहां उपचुनाव हुआ। उप चुनाव में रालोद के टिकट पर तबस्सुम हसन चुनाव जीत गईं। 2019 का चुनाव हुआ तो भाजपा ने बाजी मार ली और प्रदीप चौधरी सांसद बने। भाजपा ने इस बार फिर से प्रदीप चौधरी को टिकट दिया है। वहीं सपा ने तबस्सुम हसन की बेटी इकरा हसन को उम्मीदवार बनाया है।
कई सीटों पर अभी प्रत्याशी घोषित होने बाकी
पश्चिमी यूपी की कई सीटों पर भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है, जो अब कभी भी हो सकती है। रालोद ने अपने खाते की दोनों सीटों पर प्रत्याशी मैदान में उतार दिए हैं, जबकि भाजपा ने मेरठ, सहारनपुर और गाजियाबाद जैसी सीटों पर प्रत्याशियों के चयन को लेकर माथापच्ची कर रही है। कांग्रेस ने अभी तक यूपी में अपने प्रत्याशियों का एलान नहीं किया है। माना जा रहा है कि सहारनपुर से इमरान मसूद कांग्रेस के उम्मीदवार होंगे। वहीं बसपा ने सहारनपुर से माजिद को अपना प्रत्याशी बनाया है।
एआईएमआईएम भी अपनी छाप छोड़ने की जुगत में
इस बार चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम भी छाप छोड़ने की जुगत में है। मेरठ मेयर चुनाव में मिले वोटों के बदौलत पार्टी के हौसले काफी बुलंद हैं। इस चुनाव में एआईएमआईएम दूसरे नंबर पर थी, जबकि सपा तीसरे और बसपा चौथे नंबर पर थी। इसके अलावा 6 पार्षद इस चुनाव में एआईएमआईएम के जीते थे। पार्टी के इस प्रदर्शन ने सपा और बसपा दोनों की चिंताएं बढ़ा दी थीं। ऐसे में एआईएमआईएम को हल्के में लेने की भूल सपा-कांग्रेस या बसपा बिल्कुल नहीं करेगी।