मेरठ। वर्तमान में जो विद्वतजन एवं अनुसंधानकर्ता शोध कर रहे हैं, उनको पाश्चात्य जगत द्वारा बताए प्रतिमानों का आंख मूंदकर अनुगमन नहीं करना चाहिए। भारतीय ज्ञान परंपरा में शोध के विभिन्न आयाम बताए हैं। उनके आधार पर शोध कार्य करना चाहिए।
यहां सीसीएसयू के पंडित दीनदयाल उपाध्याय शोध पीठ एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय शोध पीठ महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय बरेली एवं प्रज्ञा प्रवाह पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के संयुक्त तत्वावधान में कार्यशाला चल रही है। यहां शुक्रवार को शिक्षक डॉ. ऋषभ मिश्र शिक्षा संकाय विभाग महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा महाराष्ट्र ने उक्त विचार व्यक्त किए। मुख्य वक्ता डॉ. देवेश मिश्र अध्यक्ष संस्कृत विभाग उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय हल्द्वानी ने कहा कि पाश्चात्य दृष्टि एवं भारतीय दृष्टि एक-दूसरे की पर्यायवाची नहीं हैं। जिसकी तुलना भारतीय दृष्टि एवं ज्ञान परंपरा से नहीं की जा सकती है। भारतीय ज्ञान परंपरा में सभी शोध कार्यों के लिए केवल एक ही शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता बल्कि शोध की प्रकृति एवं प्रवृत्ति के आधार पर उसे अलग-अलग नाम दिए जाते हैं। जैसे कि गवेषणा, अन्वेषण व अनुसंधान आदि। उन्होंने भारतीय वांग्मय एवं मूल को शोध का उद्गम स्थल एवं मूलभूत आधार बताया।
इनका रहा सहयोग
प्रो. पवन कुमार शर्मा ने सभी अतिथियों का धन्यवाद किया। कार्यशाला में भगवती प्रसाद राघव क्षेत्रीय संयोजक प्रज्ञा प्रवाह पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र, प्रो. वीरपाल सिंह, डॉ. राजेंद्र कुमार पांडेय, डॉ. देवेश मिश्र, डॉ. प्रवीण कुमार तिवारी, डॉ. भूपेंद्र प्रताप, डॉ. देवेंद्र उज्ज्वल, मितेंद्र गुप्ता, संतोष त्यागी, नितिन त्यागी एवं भानु प्रताप आदि का सहयोग रहा।