फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

शुभम हत्याकांड के चारों आरोपी जेल से बाहर

Mon, 08 Feb 2016 01:53 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, मेरठ
विज्ञापन
विज्ञापन
शहर को हिलाकर रख देने वाले तीरगरान सांप्रदायिक बवाल में हुई छात्र शुभम की हत्या का मामला फिर चर्चा में है। इस हत्याकांड के चारों आरोपी जमानत मिलने पर जेल से बाहर आ गए हैं। इसके पीछे प्रमुख कारण पुलिस और क्राइम ब्रांच का लापरवाह रवैया, लचर विवेचना और पुख्ता सुबूत नहीं जुटाना है।
विज्ञापन


जबकि नेताओं ने भी खुद की गर्दन फंसते देख इस प्रकरण से मुंह मोड़ लिया। शुभम के परिजनों को न्याय दिलाने के दावे तो खूब किए लेकिन न तो पुलिस पर दबाव बनाया और पीड़ित परिजनों की पैरवी की। यही नहीं, इस प्रकरण को पूरी तरह कमजोर करने में पुलिस-प्रशासन के अफसरों की भूमिका कठघरे में खड़ी है।

क्या था मामला
दस मई 2014 को कोतवाली क्षेत्र के तीरगरान इलाके में धार्मिक स्थल के बाहर प्याऊ के निर्माण को लेकर दो समुदाय आमने-सामने आ गए थे। देखते ही देखते पथराव और आगजनी हो गई थी। इसके बाद यह बवाल फैलते हुए सर्राफा बाजार की तरफ आ गया था। जमकर पथराव और फायरिंग के बीच दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट हुई थी।
विज्ञापन


इस बवाल के दौरान सर्राफा व्यवसायी कागजी बाजार निवासी सुशील रस्तोगी के इकलौते बेटे शुभम रस्तोगी की सिर में गोली लगने से मौत हो गई थी। शुभम का इस बवाल से कोई लेना-देना नहीं था। शहर से बाहर बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने वाला शुभम दो दिन पहले ही अपने घर छुट्टियों में आया था। बवाल के दौरान वह शनि मंदिर में दीपक जलाने गया था लेकिन बवालियों ने उसकी हत्या कर परिवार का इकलौता चिराग बुझा दिया था।

35 मुकदमे हुए थे दर्ज
इस सांप्रदायिक बवाल में अलग-अलग 35 मुकदमे दर्ज हुए थे। तत्कालीन इंस्पेक्टर कोतवाली सुभाष राणा और एसएसआई प्रभाकर कैंतुरा ने दोनों समुदाय के 17 लोगों को नामजद किया था। इसके अलावा दोनों समुदाय के लोगों ने एक-दूसरे के करीब 42 लोगों के खिलाफ केस दर्ज कराया था। जबकि सुशील रस्तोगी की तरफ से अज्ञात हत्यारों के खिलाफ कोतवाली थाने में हत्या का केस दर्ज कराया गया था। इन सभी केसों की विवेचना क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर कर दी गई थी। जिसके विवेचक राम मूर्ति यादव हैं।

पुलिस ने खुद शामिल किए थे चारों नाम
शुभम की हत्या में चार आरोपी विवेचना में सामने आए थे। जिसके बाद इस केस में बिलाल पुत्र फुरकान निवासी छत्ता अनंतराम कोतवाली, मतलूब पुत्र फजर्लुहमान निवासी ऊंचा सद्दीकनगर, खालिद उर्फ अंडा पुत्र मुस्तफा निवासी नीचा सद्दीकनगर लिसाड़ीगेट और सुल्तान पुत्र इनाम निवासी छत्ता अनंतराम, कोतवाली के नाम पुलिस ने खुद विवेचना में शामिल किए थे। इनके कब्जे से जो असलाह बरामद हुआ था, उसे फोरेंसिक जांच के लिए एफएसएल भी भेजा गया था। इसके बाद 25 जून 2014 को पुलिस ने इन आरोपियों के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट पेश कर दी थी।

एक के बाद एक छूटे 13 आरोपी
सांप्रदायिक उन्माद फैलाने के मामले में पुलिस ने 13 लोगों को जेेल भेजा था। जिसमें बिलाल, जीशान, योगेश, हिमांशु, आलम, मतलूब, नदीम, अजहर, नवीन, अमजद, अजहर, तैय्यब और अमन शुक्ला थे। इनके खिलाफ चार्जशीट खोखली थी। जिसमें मजबूत साक्ष्य के अभाव के एक के बाद एक आरोपी जेल से छूटते गए। मुकदमे पहले ही पायदान पर कमजोर साबित हुए। खासकर शुभम हत्याकांड में हाल के करीब 15 दिनों के अंतराल में तीन आरोपियों को जमानत मिली तो मुख्य आरोपी बिलाल बीते शनिवार को ही जेल से छूटा है।

कहां हुआ मुकदमा कमजोर
सांप्रदायिक बवाल में हुई शुभम की हत्या में इन चारों आरोपियों की पुलिस ने खुद नामजदगी की थी। जिनके खिलाफ बवाल के दौरान मौजूद रहे पुलिसकर्मियों के अलावा पांच अन्य लोग भी गवाह बने थे। खास बात यह है कि ये सभी पांचों लोग खुद सांप्रदायिक उन्माद फैलाने में नामजद थे। जिसके चलते उन्होंने खुद को गवाही दी ही नहीं, बल्कि पुलिस खुद भी गवाही देने से पीछे हट गई। जिसके चलते मुकदमा कमजोर पड़ गया।

कैसे खेला पुलिस ने गेम
नामजद आरोपियों को मोहरा बनाकर पुलिस ने गेम खेला है। पुलिस जानती थी कि नामजद आरोपी (जो जेल नहीं भेजे) राजनीतिक नेताओं से जुड़े हैं, जोकि विवचेना को कमजोर करने पर आवाज उठा सकते हैं। ऐसे में पुलिस खुद उन पर दबाव बनाने के लिए बीच-बीच में उनको नोटिस तामील कराती रही।

इस प्रकरण में समसुद्दीन, अकबर, शाहिद, बंटू, सलीम, बशीर, शहजाद, शादाब, विजय आनंद, पियूष, कमलदत्त शर्मा, दीपक शर्मा, सचिन नामदेव, राजकिशोर, कुलदीप, सैंकी और प्रवीण शर्मा भी नामजद थे। जो प्रमुख राजनैतिक दलों से जुड़े हैं। क्राइम ब्रांच ने जब कोर्ट में चार्जशीट भेजी तो इन्हें वांछित दिखाया। लेकिन गिरफ्तारी के बजाए दबाव के तहत नोटिस भेजकर कानूनी खानापूर्ति करती रही। ताकि किसी की आवाज न उठे। जेल में बंद शुभम हत्याकांड के आरोपियों बिलाल, मतलूब, खालिद और सुल्तान ने जब जमानत प्रार्थनापत्र लगाए तो अपनी गर्दन फंसते देख किसी ने विरोध नहीं किया।
विज्ञापन

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें