बूथवार रिपोर्ट बता रही है कि अधिकांश सीटों पर दलित मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भाजपा की तरफ चला गया जबकि कुछ हिस्सा सपा-रालोद गठबंधन को भी मिला है। इसमें सीटवार स्थानीय गणित ने भी अहम भूमिका निभाई है। मेरठ दक्षिण, शहर, किठौर और सिवालखास में दलितों का काफी हिस्सा भाजपा की तरफ चला गया। वहीं सरधना में सपा की हिस्सेदारी ज्यादा रही।
2017 के मुकाबले 2022 में मिले मत
सीट 2017 2022 कितने घटे वोट
हस्तिनापुर 63374 14240 49134
किठौर 62503 31213 31290
शहर 12636 4939 7697
सिवालखास 42524 29958 12566
कैंट 55899 28519 27380
सरधना 57239 18140 39099
दक्षिण 77727 39857 37870
योग 371902 166866 205036
मैं तीन जिलों की 13 विधानसभा सीटें देख रहा था। पार्टी ने जहां की जिम्मेदारी सौंपी, वहां पहुंचा। राजकुमार गौतम और शमशुद्दीन राईन भी मेरठ आए। जितना हो सकता उतना किया गया। यह बात सही है कि बसपा के दलित बेस वोट बैंक में गिरावट आयी है। बहनजी शीघ्र ही इसके सुधार के लिए कुछ निर्णय लेंगी। - दिनेश काजीपुर, कोर्डिनेटर बसपा।
ये बोले बसपा प्रत्याशी
चुनाव को लेकर गंभीर नहीं रहा बसपा हाईकमान
मेेरठ में भाजपा, सपा गठबंधन के बड़े नेता चुनाव प्रचार करने पहुंचे, लेकिन बसपा से कोई नहीं आया। संगठन का भी कोई सहयोग नहीं मिला। दलित और मुस्लिमों ने मान लिया की बसपा चुनाव लड़ ही नहीं रही है। यही कारण है कि दलित भाजपा और सपा गठबंधन की तरफ खिसक गया। हमें केवल 20 हजार दलित, सात हजार मुस्लिम और तीन हजार अन्य मत मिले हैं। जनता ने बहुत साथ दिया। -नन्हें खां, बसपा प्रत्याशी सिवालखास
अकेला लड़ता रहा, नहीं मिला पार्टी नेताओं का साथ
पार्टी की तरफ से दलित वोट बैंक को कोई संदेश ही नहीं दिया गया। यही कारण है कि क्षेत्र के गांव सलावा, भामोरी, रार्धना, खेड़ा आदि गांवों में दलितों के कहीं दो तो कहीं पांच वोट मिले हैं। बसपा के दलित, मुस्लिम और अन्य किसी नेता ने चुनाव प्रचार में भाग ही नहीं लिया। सरधना हॉट सीट होने और भाजपा के सीएम और सभी बड़े नेताओं के पहुंचने के बाद भी बसपा हाईकमान ने कोई निर्णय नहीं लिया। बसपा का परंपरागत वोटर दूसरों के साथ हो लिया। हमें 14 हजार दलित, दो हजार जाट और कुछ अन्य मिले हैं। - संजीव धामा, बसपा प्रत्याशी सरधना
बड़े नेता सामने ही नहीं आए, छिटक लिया दलित वोटर
कैंट में सीएम भाजपा के लिए वोट मांगने पहुंचे, लेकिन बसपा का कोई बड़ा नेता सामने नहीं आया। संगठन पूरी तरह शून्य है। दलित वोटर में निराशा रही और भाजपा व सपा के साथ हो लिया। मैं करारी हार से बेहद दुखी हूं। हमें केवल अपने संबंधों की वोट मिली है। अवसर मिला तो बहनजी को पूरी व्यवस्था से अवगत कराऊंगा। बसपा को आगे बढ़ाने के लिए संगठन में काफी परिवर्तन और सभी जातियों को साथ लेकर चलने की जरूरत है। दलित वोट बैंक को रोकने के लिए भी काम करने की जरूरत है। - अमित शर्मा, बसपा प्रत्याशी कैंट