सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद में आखिरी सुनवाई होने पर जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना सैय्यद अरशद मदनी ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि हमें पूर्ण विश्वास है कि फैसला आस्था की बुनियाद पर न होकर सबूतों के आधार पर होगा।
गुरुवार को जारी बयान में मौलाना अरशद मदनी ने तय समय पर सभी पक्षों को सुनने पर सुप्रीम कोर्ट का धन्यवाद किया। मदनी ने कहा कि वक्फ बोर्ड का चेयरमैन सिर्फ वक्फ का संरक्षक होता हैं उसका मालिक नहीं। बाबरी मस्जिद को लेकर मुसलमानों का नजरिया आज भी वही है जिसका जिक्र जमीयत उलमा-ए-हिंद हमेशा से करती आ रही है। उन्होंने कहा कि जो जगह मस्जिद के लिए वक्फ कर दी जाए वो हमेशा मस्जिद ही रहती है, उसकी पहचान में कभी कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता।
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मौलाना मदनी ने कहा कि अयोध्या विवाद को लेकर मुसलमानों का नजरिया पूरी तरह से तथ्यों और प्रमाणिक साक्ष्यों पर आधारित हैं। बाबरी मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर नहीं बनाई गई और न ही वहां कोई मंदिर था। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को पांच दिसंबर 1992 से पहले की स्थिति को बरकरार रखना चाहिए और मस्जिद को मुसलमानों को वापस देना चाहिए। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट को इस बात का आश्वासन दिया गया था कि मस्जिद से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी और उसकी पूरी निगरानी होगी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में दाखिल श्वेत पत्र के बाद भी उसका हनन हुआ। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को उस पर नोटिस लेना चाहिए और मस्जिद को रिस्टोर करना चाहिए। मौलाना मदनी ने कहा कि हम अदालत के फैसले का इंतजार कर रहे हैं और हम पूरे सम्मान के साथ फैसले को सर झुकाकर स्वीकार करेंगे।
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