आसान नहीं रहा सफर
पारुल चौधरी ने कड़ी मेहनत से फर्श से अर्श तक का सफर तय किया है। कभी टूटी और कच्ची पगडंड़ियों पर दौड़कर अभ्यास करने वाली पारुल देशभर में मेरठ का नाम रोशन कर चुकी हैं। इस पर पारुल और उनके पिता किसान कृष्ण पाल सिंह ने भी खुशी जाहिर की है। पिता का कहना है कि बिटिया की मेहनत रंग लाई है।
कच्ची पगडंडियों से शुरू की थी दौड़
पारुल ने वर्ष 2010 में कैलाश प्रकाश स्पोर्ट्स स्टेडियम में कोच गौरव त्यागी से प्रशिक्षण लेना शुरू किया था। उनके पिता ने बताया कि सबसे पहले पारुल ने गांव में कच्ची सड़क पर दौड़ना शुरू किया। भराला गांव के बीपी इंटर कॉलेज में जिला स्तरीय प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। इसके बाद ऑल इंडिया विवि चैंपियनशिप में प्रतिभा दिखाई।
प्रियंका गोस्वामी पदक की दौड़ से बाहर
मेरठ की रेस वॉकिंग की ऐथलीट प्रियंका गोस्वामी एशियन गेम्स में 42.195 किमी रेस वॉक में बाहर हो गईं। उन्हें डिस्क्वालिफाई कर दिया गया। वह पहली बार इतनी दूरी की मैराथन रेस वॉक में हिस्सा ले रही थीं। उन्हें टीआर 54.7.5 नियम के तहत डिस्क्वालिफाई कर दिया गया। इस नियम के तहत चार रेड कार्ड मिले। इसके चलते वह आगे भाग नहीं ले सकी और भारत की एक पदक की उम्मीद टूट गई।
दरअसल, रेस वॉकिंग में सामान्य दौड़ की तरह नहीं भागा जाता। इसमें दो मुख्य नियम होते हैं। लॉस ऑफ कॉन्टैक्ट में एथलीट का एक पैर हमेशा जमीन के संपर्क में रहना चाहिए। वहीं, बेंट नी में जमीन पर पड़ने वाला पैर घुटने से सीधा होना चाहिए और जब तक शरीर उसके ऊपर से न गुजर जाए, वह सीधा ही रहना चाहिए।
कैसे काम करता है नियम टी आर 54.7.5 :
एथलेटिक्स कोच गौरव त्यागी ने बताया कि जब भी कोई खिलाड़ी इन नियमों को तोड़ता है तो ट्रैक पर मौजूद अलग-अलग जज उसे रेड कार्ड देते हैं। जब किसी एथलीट को तीन अलग-अलग जजों से तीन रेड कार्ड मिलते हैं तो उसे कुछ समय के लिए पेनाल्टी जोन में भेज दिया जाता है। वहां उसे रेस की दूरी के हिसाब से (जैसे कुछ मिनट की) समय की पेनाल्टी काटनी होती है। पेनाल्टी जोन की व्यवस्था वाले इवेंट्स में, अगर किसी एथलीट को पूरी रेस के दौरान किसी भी समय चौथा रेड कार्ड मिल जाता है तो वह बाहर हो जाता है।