सरूरपुर। रमजान बड़ी बरकतों वाला महीना होने के कारण इसके दूसरे अशरे में अल्लाह ताआला लोगों के गुनाहों को ज्यादा माफ करता है। बशर्ते बंदा अपने गुनाहों की सच्चे दिल से तौबा करते हुए अल्लाह ताआला की इबादत करे। साथ ही गरीब बेसहारा लोगों की मदद करना अल्लाह को बेहद पसंद है।
जामिया सबील उल फलाह के मोहतमिम मुफ्ती इसराईल ने बताया कि अशरा अरबी का दस दिन होता है। इस तरह रमजान के पहले दस दिन में पहला अशरा, दूसरे 10 दिन में दूसरा अशरा और तीसरे दस दिन में तीसरा अशरा बंटा होता है। रमजान के पहले दस दिन में अल्लाह ताआला अपने बंदों पर रहमत बरसाता है। जो लोग अल्लाह की इस रहमत का शुक्र अदा करते हैं, उनके लिए यह रहमत और भी बढ़ती जाती है।
इसके बाद दूसरे अशरे दस दिन में बंदों की गुनाहों की मगफिरत फरमाते हैं। रमजान के बीच यानी दूसरे अशरे में रोजेदार अपने गुनाहों से पाक हो सकते हैं। मौलाना रिहान कासमी ने हदीस की रोशनी से बताया कि अल्लाह के नबी ने फरमाया है कि आदमी गुनहगार होता ही है, पर बेहतरीन गुनहगार वह है जो सच्चे दिल से तौबा करते हुए दोजख से पनाह मांगे और जन्नत में जाने की दुआ मांगे। हजरत मुहम्मद सल्ललाहु अलैहीवसल्लम ने फरमाया कि रमजान माह के रोजे फर्ज और तरावीह सुन्नत है।
तरावीह में दो सुन्नत अलग-अलग हैं। एक सुन्नत कुरान शरीफ का सुनना और दूसरा पूरे रमजान की तरावीह पढ़ना है। यदि कोई शख्स 8-10 दिन की तरावीह पढ़कर सोचे कि पूरा ाशबाब मिल गया तो ऐसा नहीं है। कुरान शरीफ तो सुन लिया, लेकिन बचे 20 दिन की तरावीह की सुन्नत छूट गई। जिनको रमजान के महीने में सफर करना जरूरी हो तो कम दिन के शबीने में तरावीह पढ़ सकता है।