संतान की लंबी आयु के लिए रविवार को अहोई माता का व्रत रखा जा रहा है। माताएं उषाकाल से गोधूलि बेला तक उपवास करेंगी। शाम को तारों को देखकर अर्घ्य देकर व्रत पूरा होगा। कुछ महिलाएं चंद्रमा के दर्शन कर व्रत खोलती हैं।
रविवार सुबह 8.45 तक पुष्य नक्षत्र है। अष्टमी सुबह 7 बजकर 31 मिनट पर प्रारंभ हो रही है। अहोई पूजा का समय शाम 5.30 बजे से रात 8.15 मिनट तक है। अहोई अष्टमी के दिन, वार व नक्षत्र का अति उत्तम संयोग बन रहा है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार रविवार को पुष्य नक्षत्र है। रवि पुष्य योग के साथ अहोई अष्टमी के दिन सर्वार्थ सिद्ध योग भी है। आज नया काम शुरू करना शुभ होगा।
दीवार पर करते अहोई चित्रांकन
अहोई पर्व करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। दीवार पर गोबर या गेरु से अहोई बनाते हैं। कैलेंडर भी लगाते हैं। कपड़े पर आठ कोष्ठक की एक पुतली बनाई जाती है और उसके बच्चों की आकृतियां बना दी जाती हैं। दिनभर निर्जल व्रत कर शाम को अहोई माता का पूजन होता है। करवाचौथ में प्रयोग हुए करवे में जल भरते हैं। अहोई माता की पूजा करके उन्हें दूध-चावल का भोग लगाना शुभ होता है।
चांदी की हुई खरीदारी
अहोई पूजन में कुछ माताएं चांदी के दाने की माला पहनती हैं। हर साल माला में दो चांदी के दाने पिरोए जाते हैं। उस माला को पूजा के बाद धारण कर किसी अच्छे दिन पूजा करके उतारा जाता है। कुछ माताएं चांदी के छल्ले व कंगन पहनकर पूजन करती हैं। उसमें हर वर्ष चांदी बढ़वाती हैं। चांदी की स्याहू का पूजन भी होता है। सराफा बाजार में अहोई के मनके, कंगन, छल्ला और चांदी की स्याहू खरीदने के लिए काफी भीड़ रही।
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