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जिंदगी को धुआं कर रहे कोल्हू

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खरखौदा।
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नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की सख्ती के बाद कमिश्नर ने खुले में निर्माण सामग्री बिक्री रोकने एवं पुराने वाहनों को सीज करने की कार्रवाई करने का आदेश दिया है। वहीं, ग्रामीण क्षेत्र में कई दर्जन कोल्हू जहर उगल रहे हैं। इनमें से एक में भी मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है। इन कोल्हुओं ने ईंधन के रूप में प्लास्टिक, पॉलीथिन एवं रबर आदि जलाने से भी परहेज नहीं किया जा रहा है। जिससे इनसे निकलने वाला धुआं जहरीला हो गया है।
एनसीआर में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है। इसकी रोकथाम के लिए इस बार सुप्रीमकोर्ट ने दिपावली पर भी आतिशबाजी की बिक्री नहीं किए जाने का आदेश दिया था। इसके बावजूद प्रदूषण का स्तर कम नहीं हुआ। इसके चलते पिछले कई दिन से स्मॉग के कारण एनसीआर में धुंध छाई हुई है। एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण पर एनजीटी सख्त हुई। इस पर कमिश्नर के आदेश पर पूरे शहर में खुले में बिक रही निर्माण सामग्री पर रोक लगाने एवं पुराने वाहनों को सीज करने की कार्रवाई शुरू कर दी गई। उधर, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सात विभागों को नोटिस दिए हैं। शहर समेत इस प्रदूषण को बढ़ाने में ग्रामीण क्षेत्र भी पीछे नहीं है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड केवल खेतों में जलने वाली पराली को भी प्रदूषण का मुख्य कारण मान रहा है। हालांकि खरखौदा क्षेत्र में करीब दो दर्जन कोल्हू जहरीला धुआं उगल रहे हैं। इनकी ओर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की नजर नहीं है। सीजन के शुरुआत में ही प्रशासन ने कोल्हू चलाने के लिए कुछ मानक तैयार किए थे। हालांकि वे आदेश चिमनी के धुएं में उड़ते दिखाई दे रहे हैं। क्षेत्र में कई कोल्हू तो आबादी के भीतर कार्यरत हैं। इन कोल्हुओं पर एक भी मानक के अनुरूप संचालित नहीं किया जा रहा है। शासन ने कोल्हू चलाने से पहले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एनओसी, धुआं निकलने वाली चिमनी की ऊंचाई एवं ईंधन के रूप में प्रयोग होने वाली सभी वस्तुएं निश्चित की थीं। इसके बावजूद सभी कोल्हू जहरीला धुआं उगल रहे हैं। धूप नहीं निकलने की वजह से गन्ने की खोई नहीं सूख पा रही है। ऐसे में कोल्हुओं में प्लास्टिक, पालीथिन एवं रबर आदि जलाने से परहेज नहीं किया जा रहा है। किसी भी कोल्हू पर अभी तक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जांच करके कार्रवाई नहीं की है। वहीं, कोल्हू स्वामी गन्ने की खोई को बाजार में बेचकर मुनाफ कमा रहे हैं।
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सांस लेने में हो रही परेशानी
कोल्हुओं के धुएं के चलते वातावरण प्रदूषित हो गया है। इससे बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा के मरीजों को सांस लेने में परेशानी हो रही है। प्रदूषण अधिक होने के कारण बचाव के परंपरागत तौर तरीके भी नाकाम साबित हो रहे हैं। जिसके चलते पीड़ित लोग चिकित्सकों की ओर रुख करने को मजबूर हैं। वहीं, चिकित्सक भी इसका स्थायी समाधान नहीं कर पा रहे हैं। वे दवा के साथ बचाव के तरीके बताकर मरीजों को राहत देने की कोशिश में लगे हैं।

ग्राम पांची निवासी सुरेश चंद का कहना है कि गांव में 14 कोल्हू संचालित किए जा रहे हैं। इनमें से कई आबादी के बीच में हैं। इनसे निकलने वाले धुएं से सुबह और शाम को सांस लेने में काफी परेशानी होती है। कई बार चिकित्सक के पास जाना पड़ता है।
संजय का कहना है कि कोल्हुओं से निकलने वाले जहरीले हुए से आंखों में जलन, एलर्जी और सांस लेने में परेशानी की समस्या आम हो गई है। सरकारी अधिकारी इन कोल्हू संचालकों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।
महेंद्र सिंह का कहना है कि कोल्हुओं को तत्काल प्रभाव से आबादी से बाहर किया जाना चाहिए। इनमें खोई के अतिरिक्त दूसरे ईंधन का इस्तेमाल किए जाने पर कड़ी रोक लगानी चाहिए। उनका कहना है कि प्रदूषण का असर मवेशियों की सेहत पर दिखने लगा है।
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खरखौदा सीएचसी प्रभारी डॉ. आरके सरोहा का कहना है कि कोल्हुओं में जलाई जाने वाली गन्ने की खोई इतनी हानिकारक नहीं होती है। कोल्हू संचालक निजी लाभ के लिए खोई को बाजार में बेचकर दूसरी वस्तुओं को ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। जिससे निकलने वाला धुआं सेहत पर बुरा असर डाल रहा है। इस पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए।
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