मऊ। जिले में शुगर का खतरा वयस्कों, प्रौढ़ और वृद्धों को ही नहीं है, बल्कि अब यह बच्चों और युवाओं पर भी मंडरा रहा है। जिला अस्पताल के एनसीडी क्लीनिक और बाल रोग विभाग में हर महीने दो से तीन मामले ऐसे आ रहे हैं, जिनमें 12 वर्ष से कम बच्चों में शुगर की शिकायत मिल रही है। वहीं, युवाओं में यह ग्राफ शुगर के कुल मरीजों का 25 फीसदी है। डाॅक्टरों का तर्क है कि बच्चों और परिवार में खानपान की आदत, जीवन शैली और कुछ मामलों में आनुवांशिक कारण इसके लिए जिम्मेदार हैं।
कोपागंज ब्लाॅक के सरवा गरीबपुर निवासी श्रीकेश तिवारी ने बताया कि बारह वर्ष के बेटा मंगलम तिवारी का शुगर के चलते निधन हो गया। बताया कि एक अप्रैल को उनके बेटे को कई बार उल्टी होने पर वह उन्हें कोपागंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे। वहां तीन अप्रैल को जांच में उसका शुगर 600 से ज्यादा मिला। श्रीकेश तिवारी ने बताया कि छह अप्रैल को इलाज के दौरान मौत हो गई। श्रीकेश ने बताया कि घर में किसी को शुगर नहीं था। उधर, बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. कंचनलता आजाद बताती हैं कि हर माह एक से दो बच्चों में शुगर की बीमारी मिलने पर उन्हें भर्ती करने की जरूरत भी पड़ रही है। मधुमेह के चलते इनकी हालत बिगड़ जा रही है। शुगर की बीमारी से इन बच्चों के परिजन अनजान बने रहते हैं। जांच कराने के दौरान यह बीमारी सामने आ रही है। डाॅक्टर बताती हैं कि बच्चों को आजकल आसानी से हाई कैलोरी, हाई फैट और प्रोसेस्ड खाना उपलब्ध है। बच्चे इनको ज्यादा पसंद कर रहे हैं। प्राकृतिक खाना कम पसंद करते हैं। साथ ही शारीरिक गतिविधि भी कम हो गई है। इससे जितना खाते हैं, उतनी शुगर को कंज्युम नहीं कर पाते हैं। इससे मोटापा बढ़ता है और मधुमेह की समस्या भी।
नौ माह में तीन लाख की जांच में 12 हजार से अधिक में मिला शुगर
मऊ। नोडल अधिकारी और एसीएमओ डॉ. बीके यादव ने बताया कि शुगर के मरीजों का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। बीते वर्ष 13 हजार लोगों में शुगर की बीमारी चिह्नित की गई थी। इसमें 15 फीसदी करीब 25 वर्ष से 45 वर्ष के युवा शामिल थे। बताया कि इस वर्ष जनवरी से अब तक तीन तीन लाख लोगों की जांच की गई है। इसमें बारह हजार से अधिक लोगों में शुगर मिला। इसमें 1558 लोगों की उम्र 25 से 45 वर्ष के भीतर है।
बच्चों और बड़ों के मधुमेह में फर्क
मऊ। आईएमए के पूर्व अध्यक्ष डॉ. संजय सिंह ने बताया कि बड़ों में टाइप टू डायबिटीज होता है। बच्चों के मामलों में इंसुलिन की कमी होने लग जाती है। इंसुलिन बनाने वाला पैनक्रियाज इसे बनाना बंद कर देता है। इसके बहुत से कारण हो सकते हैं। इसी के चलते दोनों का उपचार भी अलग है। बताया कि बच्चों के मामलों में ध्यान रखने की जरूरत है। इसमें बच्चे सही समय पर खाना खाएं, नाश्ता करें, शारीरिक गतिविधियों में शामिल रहें और पर्याप्त नींद के साथ ही जंक और प्रोसेस्ड फूड से बचें।
डायबिटीज टाइप - 1 : यह जेनेटिक रोग है। इसमें बच्चे में पैदाइशी डायबिटीज होती है। यह ऑटो इम्युन डिस्आर्डर है।
डायबिटीज टाइप-2 : यह रोग बड़ों में मोटापा बढ़ने, संक्रमण, अग्नाशय की बीटा सेल क्षतिग्रस्त होने से होता है।
डायबिटीज टाइप-3 : यह रोग अधिक ध्रुमपान, शराब पीने, अग्नाशय में कैल्शियम जमने से होता है।