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जिले में जांच की आंच में तप रहा मनरेगा, तो बेरोजगार होने लगें मजदूर

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मऊ। सरकार ने कारोना संकट से महानगरों और अन्य प्रदेशों से गांवों में आए मनरेगा मजदूरों को रोजगार देने का प्रावधान किया है। इसके तहत गांव सभाओं के खातों में बजट भी दे दिया था। लेकिन एक बार कुछ दिनों तक तो गांवों में मनरेगा मजदूरों को काम मिला लेकिन अब कई गांवों में कई दिनों से काम बंद है। जहां काम हुए हैं वहां भी मजदूरों की मजदूरी बाकी है। जनपद में मनरेगा मजदूरों की लगभग ढाई करोड रुपये मजदूरी बकाया है।
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जनपद में कुल 678 गांवों में एक लाख 83 हजार 234 जॉब काड़ॱर धारक मजदूर पंजीकृत हैं। इनमें से 652 गांवों में काम चल रहा है, जिसमें एक लाख 60 हजार 445 मजदूरों को रोजगार दिया गया। कोरोना संकट के कारण गांवों में आए प्रवासी मजदूरों को रोजगार दिलाने के लिए सरकार ने जनपद को 33 करोड़ का बजट दिया है। गांवों में प्रधानों ने प्रवासियों और पहले से गांवों में रह रहे मजदूरों को 21 अप्रैल से काम उपलब्ध कराया। गांवों में चकमार्ग, पोखरों, नहरों की सफाई, खेतों का समतलीकरण आदि काम शुरु करा दिए गए।
ज्यादातर नीजी पोखरों की खुदाई के काम कराए गए। लेकिन ब्लाक स्तर से किए गए गोलमाल उजागर होने पर अब पूरे जिले में मनेरगा जांच की आंच में तपने लगा है। इसका परिणाम है कि वर्तमान में सभी गांवों में मनरेगा के तहत होने वाले काम बंद हैं। मजदूर मस्टररोल बनने के बाद मजदूर मजदूरी खातों में आने का इंतजार कर रहे हैं। अकेले परदहां ब्लाक के 51 गांवों में से सिर्फ 45 गांवों में काम चल रहा था। लेकिन छह गांवों में अब काम ठप हैं।
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इस ब्लाक के 15 हजार 145 मजदूरों में से सिर्फ 5684 को ही काम मिला है। शेष अभी काम मिलने के इंतजार में हैं। यही स्थिति लगभग सभी ब्लाकों और गांवों की है। जिले के नौ ब्लाकों में मजदूरों के लगभग ढाई करोड़ से अधिक की मजदूरी बकाया है। इस बाबत डीडीओ विजय शंकर राय का कहना है कि मस्टर रोल बनने के एक सप्ताह तक मजदूरी बकाया ही रहती है लेकिन प्रक्रिया पूरी होते ही मनरेगा मजदूरों के खातों में मजदूरी के रुपये भेज दिए जाते हैं।
प्रवासियों को अपेक्षा के अनुरूप नहीं मिली मदद
सरकार की घोषणा के अनुरूप प्रवासी मजदूरों को रुपयों की मदद नहीं मिल पाई है। महानगरों और अन्य प्रदेशों से गांवों में पहुंचने वाले प्रवासियों के पास रुपये नहीं थे। मनरेगा योजना की गाइड लाइन के अनुसार काम करने के एक सप्ताह से लेकर दस दिन के बाद मस्टर रोल बनाया जाता है। ब्लाक से लेकर जिला मुख्यालय तक के अधिकारियों की स्वीकृति के बाद मजदूरों के बैंक खातों में रुपये आने में एक सप्ताह से अधिक का समय लग रहा है। गांवों में खाली हाथ पहुंचे मजदूरों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए रुपयों की जरूरत है जो इस समय उन्हें नहीं मिल पा रही है। काम करने के बाद कागजी खानापूरी होने तक मजदूरों को रुपयों के लिए इंताजार करना पड़ रहा है। समाजसेवी अरविंद मूर्ति कहते हैं कि मनरेगा उद्देश्यों से भटक गई है।
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