जांच टीम ने क्षतिग्रस्त डबल डेकर बसों के निरीक्षण में पाया कि बसों में आपातकालीन गेट नहीं होने से लपटों में घिरने के बाद यात्रियों को भागने का मौका नहीं मिल सका। जबकि बच्चों को बसों की खिड़कियों के शीशे तोड़कर बाहर निकाला और युवा सवारियां भी बाहर आ गईं। कई बसों के शीशे आपाधापी में टूट नहीं सके। यही कारण रहा कि ज्यादातर मृतक इन्हीं बसों में सफर करने वाले यात्री रहे। वहीं आंबेडकर नगर डिपो की रोडवेज बस भी इसी दुर्घटना में पूरी तरह जल चुकी है। लेकिन इसमें आपातकालीन गेट था। इसमें सफर करने वाले ज्यादातर यात्रियों की जान बच गई। हादसे में बस के दो चालकों और दिल्ली के एक यात्री की मौत हुई। वहीं अन्य सभी मौतें निजी बसों में सवार यात्रियों की हुई।
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स्लीपर बसों में सीटों के मानक भी समान नहीं
इन बसों में सीट और स्लीपर सीटों में भी मानक समान नहीं होता है। कई बसों में 56 तो कई में 65 सीटें तक होती हैं। दो लेन में स्लीपर होते हैंं। जांच कमेटी अब इस तथ्य पर भी अपनी रिपोर्ट देगी कि निजी बसों में आपातकालीन द्वार की अनिवार्यता होनी चाहिए। वहीं पुलिस ने डबल डेकर बसों में सफर करने वाले प्रत्येक यात्री के परिजन से संपर्क करके ब्योरा लिया जा रहा है कि कहीं कोई यात्री लापता तो नहीं है। एसपीआरए सुरेशचंद्र रावत ने बताया कि यात्रियों के परिजनों के डीएनए सैंपल लिए जा रहे हैं। जो भी पीड़ित पहुंच रहे हैं, उनका ब्योरा लिया जा रहा है।
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