मथुरा। देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि रविवार को है। उनकी स्मृतियों के साथ भगवान श्रीकृष्ण की जन्म और लीला भूमि का भी नाता है। वे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यहां आए थे। कई दिन उन्होंने मथुरा, वृंदावन, गोकुल, गोवर्धन का भ्रमण करते हुए स्वतंत्रता आंदोलन की अलख ब्रजवासियों में जगाई थी। उनकी एक रात यहां पुलिस की बैरक में भी गुजरी थी। राष्ट्रपिता का अस्थि कलश अब भी राजकीय संग्रहालय मथुरा में मौजूद है। गांधी जी की स्मृतियों में अनेक बार मथुरा का उल्लेख मिलता है।
डॉ. अशोक बंसल बताते हैं कि गांधी जी की आत्मकथा में भी मथुरा का उल्लेख है। इसमें गांधी जी को मथुरा पुलिस बैरक में रखे जाने की बात कही गई है। वे बताते हैं कि 1919 में आतंकवादी अपराध अधिनियम (काला कानून) के खिलाफ देश भर में हड़ताल हुई थी। गांधी जी मुंबई से दिल्ली और अमृतसर के लिए रेल यात्रा पर निकले थे। उन्हें पलवल हरियाणा में अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार कर लिया और वापस ले आए। रात का वक्त हो जाने पर महात्मा गांधी को मथुरा पुलिस बैरक में रखा गया। सुबह होते ही मालगाड़ी से राजस्थान रवाना किया।
१९२१ और १९२९ में भी राष्ट्रपिता का मथुरा आगमन हुआ। वे जवाहर लाल नेहरू के साथ मथुरा आए थे। यहां पुराने शहर के बीच बने पार्क में स्वतंत्रता आंदोलन के अंतर्गत चल रहे आमरण अनशन स्थल पर सभा को संबोधित किया था। इस पार्क को अब गांधी पार्क कहा जाता है। जिला अस्पताल के निकट पुराने पोस्ट आफिस में ठहराया गया था। महात्मा गांधी ने इस दौरान वृंदावन, गोकुल, गोवर्धन में आजादी के आंदोलन की अलख जगाई थी।
राजा महेंद्र प्रताप के देश प्रेम के थे कायल
महात्मा गांधी ब्रज भ्रमण के दौरान वृंदावन गए थे। उन्होंने प्रेम महाविद्यालय का भ्रमण किया था। वे राजा महेंद्र प्रताप के देश प्रेम से बेहद प्रभावित थे।
ब्रजभूमि में गायों की दशा से हुए दुखी
डॉ. धर्मराज ने बताया कि महात्मा गांधी अलीगढ़ मार्ग से कई स्थानों पर जनसभाएं करते हुए मथुरा पहुंचे तो, उन्हें श्रीकृष्ण की जन्मभूमि होने का कोई लक्षण न देख, उनको बड़ा दुख हुआ। उन्होंने इस पर दुख भी व्यक्त किया था। कहा था कि यहां आने वाले असंख्य दर्शनार्थी इस अभिलाषा से आते हैं कि मथुरा गोपाल की जन्मभूमि है। लीला भूमि है। यहां पर सर्वोत्तम गाय देखने को मिलेगी, लेकिन मैं मथुरा की सड़कों से गुजरता हुआ देख रहा हूं कि गायों की हड्डियां बाहर निकल रही हैं, गायें इतना कम दूध देती हैं कि आर्थिक बोझ बन जाती हैं। इस पवित्र स्थान में मैंने बूचड़खाना भी देखा है। बालकृष्ण के प्रति उपासना का दंभ हम भरते हैं, उससे अच्छा है, अपने कर्तव्य का पालन करें।