मथुरा। पद्मश्री मोहन स्वरूप भाटिया का कहना है कि पाश्चात्य संस्कृति में डूबे आज के युवा और बालक- बालिकाएं भी अपनी मातृभूमि की समृद्ध संस्कृति के परंपराओं से परिचित नहीं हैं। ब्रजभाषा क्षेत्र के शीर्षस्थ साहित्यकार भी अष्टछाप कवियों के साहित्य से परिचित नहीं हैं।
दुनियाभर के 40 विश्वविद्यालयों में सूर-साहित्य पढ़ाया जाता है, किंतु भारत के सभी विश्वविद्यालयों में नहीं पढ़ाया जाता है। भारत में अनेक कवि एवं लोक कवियों ने महाकवि सूरदास की काव्य परंपरा में रचनाएं की हैं जो लोक प्रचलित भी है, किंतु कृतघ्नता यह कि उनकी रचनाएं लाखों कंठों हैं मगर रचनाकार का नाम नहीं पता है। ऐसे लोक कवियों में थे स्वामी मेघश्याम। उनका लोकप्रिय रसिया प्रचलित है मैया करि दै मेरौ ब्याहु, मंगाइ दै दुलहन गोरी सी..। यह रसिया गांव-गांव में गाया जाता है, लेकिन अधिकांश लोगों को इसके रचयिता बरसाना के निकट कमई गांव के निवासी स्वामी मेघश्याम शर्मा का पता नहीं है। पद्मश्री भाटिया कहते हैं कि इसी तरह मेघश्याम ने एक अन्य रसिया लिखा जोकि बहुत प्रचलित हैं। वह बताते हैं कि कृष्ण जब द्वारिका चले गए तो वहां न तो कोई उनका गुनगुने पानी से मुंह धोता था और न आंचल से पौंछता था। द्वारिका में कोई माखन-रोटी का नाम नहीं जानता था। सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि राजाधिराज तो सब कहते किंदु ''कनुआ'' कहकर कोई नहीं पुकारता था। इसी पीड़ा को कृष्ण ने अपने सखा उद्धव को मैया जसोदा के पास संदेश भेजा.. ऊधो, मैया कूं सुनइयो, तेरौ लाला दुख पावै। भाटिया का कहना है कि स्वामी मेघश्याम के साहित्य और रचनाओं का मंचीय प्रस्तुतिकरण होना चाहिए।