वृंदावन। पितृ पक्ष के आगमन के साथ ही ब्रजमंडल की भूमि सांझी की रंग-बिरंगी छवियों से सज उठेगी। श्रीकृष्ण और राधारानी की लीलाओं को समर्पित यह लोक परंपरा केवल सजावट नहीं, बल्कि श्रद्धा, साधना और सृजनशीलता का अनुपम उदाहरण है। इस मौके पर वृंदावन के प्रमुख मंदिरों में सांझी दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने की संभावना है।
मान्यता है कि जब श्रीकृष्ण गौचारण से लौटते थे तो राधारानी अपनी सखियों संग मार्ग को पुष्पों और पत्रों से सजाया करती थीं। यही परंपरा कालांतर में मंदिरों में सांझी के रूप में परिवर्तित हुई। राधावल्लभ मंदिर, सेवाकुंज, यशोदानंदन मंदिर, भट्ट जी मंदिर सहित अनेक स्थलों पर सांझी की अनुपम छटा देखने को मिलेगी। वृंदावन शोध संस्थान द्वारा 7 सितंबर से 14 सितंबर तक आठ दिवसीय सांझी महोत्सव का आयोजन किया जाएगा। इस महोत्सव में जल, रंग और गाय के गोबर से निर्मित सांझियों का प्रदर्शन होगा। संस्थान के निदेशक डॉ. राजीव द्विवेदी ने सभी श्रद्धालुओं इसमें सहभागी बनने की अपील की है।
पुष्प, रंग और जल से बनेगी राधाकृष्ण की लीला
सांझी सजाने की प्रक्रिया अत्यंत कलात्मक होती है। मंदिरों में पहले पुष्प सांझी बनाई जाती है और फिर रंग सांझी का निर्माण होता है। सूखे रंगों से बनी यह रचना न केवल सौंदर्य का प्रतीक होती है बल्कि एक साधना भी है। जल पर और जल के भीतर रंगों से बनाई जाने वाली सांझियां श्रद्धालुओं को अभिभूत कर देती हैं।
वृंदावन शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. राजेश शर्मा के अनुसार सांझी पर आधारित साहित्य वल्लभ, निम्बार्क, राधाबल्लभ, गौड़ीय, हरिदासी आदि अनेक संप्रदायों द्वारा रचा गया है। पांच शताब्दियों से चली आ रही यह परंपरा अब भी जीवंत है। संस्थान में सुरक्षित प्राचीन पांडुलिपियां इसकी साक्षी हैं।