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-राधा दामोदर की चार परिक्रमा से मिलता है गिर्राज परिक्रमा का फल

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वृंदावन। कार्तिक मास में किया गया दान, धर्म और कर्म का फल अक्षय होता है। देश और विदेश से आए श्रद्धालु कार्तिक मास में भक्ति और पूजा पाठ में जुटे हैं। पवित्र कार्तिक मास में वृंदावन के सप्त देवालयों में से एक राधा दामोदर मंदिर में हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन परिक्रमा कर रहे हैं। मंदिर के सेवायत कृष्ण बलराम गोस्वामी ने बताया कि कार्तिक मास में श्री राधा दामोदर मंदिर की चार परिक्रमा करने मात्र से गोवर्धन की सात कोस की एक परिक्रमा का पुण्य लाभ सहजता से प्राप्त हो जाता है।
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सेवायत ने बताया कि मंदिर में भारतीय ही नहीं बल्कि अपितु विदेशी भक्त भी पूरे श्रद्धा भाव से परिक्रमा कर दान पुण्य कमा रहे हैं। वहीं, आचार्य बनवारी लाल गौड़ के अनुसार शास्त्रों में कार्तिक मास को दामोदर माह भी कहते हैं। कार्तिक मास में तैतीस करोड़ देवी देवता मनुष्य के सन्निकट रहते हैं। कहा कि ठाकुरजी कार्तिक मास के सुप्रभाव से आपदाओं तथा संकेतों से मुक्त कर मनुष्य के सभी मनोरथों को पूरा करते हैं।
सैंकड़ों वर्ष पुरानी है राधा दामोदर मंदिर में परिक्रमा देने की परंपरा
वृंदावन। कृष्ण बलराम गोस्वामी ने बताया कि प्राचीन श्रीराधा दामोदर मंदिर की चार परिक्रमाएं करने से गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा का फल मिलता है। सैंकड़ों वर्ष पुराने इस मंदिर की परिक्रमा करने से उसमें विराजमान गिरिराज शिला की स्वत: परिक्रमा हो जाती है। इसकी एक किलोमीटर से भी कम की चार परिक्रमाएं करने से श्रृद्धालु गिरिराज गोवर्धन की सात कोस (25 किलोमीटर) लंबी परिक्रमा का पुण्य अर्जित कर लेता है।
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बताया जाता है कि संवत 1599 सन 1543 की माघ शुक्ल दशमी के दिन श्रीरूप गोस्वामी ने यहां राधा दामोदर जी के विग्रहों की स्थापना करके उनकी सेवा का भार जीव गोस्वामी को सौंपा। बताया जाता है कि सनातन गोस्वामी नित्य गिरिराज की परिक्रमा करते थे। वृद्धावस्था में उनकी असमर्थता को देखकर भगवान ने बालक रूप में प्रकट होकर उन्हें डेढ़ हाथ लंबी वट पत्राकार श्याम रंग की गिरिराज शिला दी। उस पर भगवान के चरण चिन्ह के साथ ही गाय के खुर का भी चिन्ह हैं। भगवान ने गोस्वामीजी को आदेश दिया कि अब वह वृद्धावस्था में गिरिराज पर्वत की बजाय इसी शिला की परिक्रमा कर लिया करें। उनके शरीर त्यागने के बाद शिला इसी मंदिर में स्थापित कर दी गई और तब से श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर की चार परिक्रमाएं लगाए जाने की परंपरा चल पड़ी है।
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