पुलिस मुठभेड़ के बाद बैठने वाली जांच। हार्डकोर क्रिमिनल को मारने के बाद इनाम की जगह कार्रवाई की तलवार का खौफ, ऐसे मौकों पर उच्च अफसरों का पुलिस कर्मियों के साथ न खड़ा होना, यही वजह है कि साथी को घिरता देख भी पुलिस कर्मी एक्शन मोड पर नहीं आ रहे हैं, बल्कि साथी को छोड़ भाग रहे हैं। यह मानना है लंबे समय तक पुलिस विभाग में अहम पदों पर रह चुके रिटायर्ड आईपीएस अधिकारियों का। उनका कहना है कि यही हालात रहे तो पुलिस में जाने को भी कोई तैयार नहीं होगा।
मथुरा के जवाहर बाग में एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और थानाध्यक्ष संतोष यादव की हत्या। फिर बदायूं और हापुड़ में दरोगाओं को मार डालने की घटनाओं ने पुलिस के रिटायर अफसरों को भी बेचैन कर दिया है। इन लोगों का कहना है कि प्रदेश में पुलिस का इकबाल कमजोर पड़ रहा है। पुलिस पर बढ़ते हमलों का बड़ा कारण यही है। अधिकारी अब पुलिस का नहीं बल्कि सरकार का हो गया है।
पुलिस की असली मुठभेड़ भी फर्जी मानने लगते हैं
सेवानिवृत्त आईपीएस हरिशंकर शुक्ल का मानना है कि हो सकता है कुछ मुठभेड़ गलत हुई हों लेकिन अधिकांश सही होती हैं। जब पुलिस किसी बदमाश को मुठभेड़ में ढेर कर देती है तो उससे तमाम सवाल पूछे जाते हैं। सीबीसीआईडी जांच होगी। मजिस्ट्रेटी जांच बैठेगी। अगर कोई हल्ला मच गया तो बदमाशों को मारने वाले पुलिस वालों पर 302 का केस हो जाता है। अब इन हालातों में कौन खुद को फंसाना चाहेगा।
अब तो पुलिस अफसर भी नहीं दे रहे फोर्स का साथ
रिटायर्ड आईपीएस राजबहादुर सिंह का कहना है कि पुलिस अधिकारी पहले अपनी फोर्स का होना चाहिए बाद में किसी दूसरे का। लेकिन आज उल्टा हो गया है। पहले वह सरकार का आदमी हो गया है बाद में फोर्स का। पुलिस वाले तो कमजोर पड़ ही जाएंगे। घटना के बाद खुद अधिकारी कहने लगते हैं कि तुम्हें गोली नहीं चलानी चाहिए थी।
मुठभेड़ करने वाली टीम में नाम लिखवाने से भी डरते हैं
पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह का कहना है कि एक समय था जब बेहतर काम करने वाले पुलिस वालों को पुरस्कृत किया जाता था। अगर पुलिस वाले कोई बदमाश मार देते थे तो शाबाशी मिलती थी। लेकिन अब इतनी जांच में उसे घेर लिया जाता है कि वह सोचने लगता है कि उसने गोली चलाई ही क्यों थीं।
इन अफसरों के सुझाव
- गश्त पर जाने वाली पुलिस को पिस्टल और रिवाल्वर दिए जाएं
- पुलिस लाइन और ट्रेनिंग सेंटरों में नियमित प्रशिक्षण दिया जाए
- पुलिस अधिकारी अपनी टीम का विश्वास कायम करें
- ट्रांसफर पोस्टिंग में सियासी दखल पूरी तरह बंद होना चाहिए
- अच्छे और ईमानदार पुलिस वालों को मिले अच्छी जगह तैनाती
- अच्छा काम करने वाले पुलिसकर्मियों को पुरस्कृत किया जाए
- किसी बड़ी घटना पर अधिकारी टीम के साथ मौजूद रहें
- किसी भी आपरेशन को अफसर खुद आगे रहकर पूरा करें
- पुलिस पर हमला करने वालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए
प्रदेश में शहीद हुए पुलिस वाले
एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी (मथुरा)
थानाध्यक्ष संतोष यादव (मथुरा)
सर्वेश यादव (बदायूं)
सुखवीर सिंह (हापुड़)
अनिल कुमार (प्रतापगढ़)
जिया उल हक (प्रतापगढ़)
तंजील अहमद (बिजनौर)
अख्तर खान (नोएडा)
आरपी द्विवेदी (इलाहाबाद)
मनोज मिश्रा (बरेली)
पुलिस पर कहीं ट्रक चढ़ा दे रहे हैं तो कहीं कार
पुलिस पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं। कहीं पशु तस्कर उन पर ट्रक चढ़ा दे रहे हैं तो कहीं कार। उन पर खुलेआम फायरिंग की जा रही है। ब्रज क्षेत्र में इस प्रकार की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। मथुरा, मुरादाबाद, मेरठ, अलीगढ़, बदायूं, कानपुर, गोरखपुर, लखनऊ, नोएडा और गाजियाबाद में इस प्रकार के मामले सामने आए हैं।
तनाव में फोर्स, बढ़े रोगी
पूर्व डीजीपी ब्रजलाल का कहना है कि बीस फीसदी पुलिस वाले तनाव की समस्या से ग्रस्त हैं। किसी को ब्लड प्रेशर ने जकड़ लिया है तो कोई शुगर का मरीज हो गया। दिल के रोगी बन रहे हैं। लगातार की ड्यूटी ने भी तनाव दे रखा है। फोर्स कम है काम ज्यादा। उनका कहना है कि गश्त करने वाली टीम को अलग बनाया जाए।