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सच्ची सहेली की भांति रक्षा करती हैं सांचौली देवी

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मां सांचौली वाली देवी। - फोटो : MATHURA
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नंदगांव (मथुरा)। मां सांचौली के मंदिर के इतिहास के अनुसार नंदगांव के जाब गांव के राजा घोष की पुत्री चंद्रावलि कान्हा की भक्त थीं। वह सांचौली के जंगलों में उनसे मिलने देवी दर्शन के बहाने जाती थीं। एक दिन राजा के किसी कर्मचारी ने चंद्रावलि के श्रीकृष्ण से मिलने की शिकायत राजा से कर दी। राजा की पुत्री अगले दिन पुन: श्रीकृष्ण से मिलने र्गइं। पीछे उसके पिता भी सेना के साथ वहां पहुंच गए। पिता और सेना को आता देख कन्या ने अपनी लाज बचाने की गुहार कान्हा से लगाई। तब श्रीकृष्ण ने देवी का रूप धारण कर राजा को दर्शन दिए। बाद में राजा ने देवी का मंदिर बनवाया।
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अन्य कथा के अनुसार कन्हैया नंदगांव से गाय चराने के लिए वनों में भ्रमण करते थे और राधारानी उनसे मिलने के लिए वन में आती थीं। एक दिन राधे जू अपनी सखियों के साथ प्रियतम से मिलने को चलीं तभी वृषभानु बाबा ने टोक कर पूछा कि राधा तुम कहां जा रही हो। हड़बड़ाहट में राधाजी के मुख से निकल गया कि वह देवी मां की पूजा के लिए जा रही हैं। इतना सुनते ही वृषभानु जी ने उनके साथ अपने सेवकों को भेज दिया ताकि वे देखकर आएं कि राधे जू किस देवी की पूजा करती हैं। सेवकों को अपने साथ चलता देख राधा जी विचलित हो उठीं और कृष्ण मिलन का भेद खुल जाने से डर गईं।
ऐसी विषम परिस्थिति में राधारानी ने अपने जीवन प्राण नंदनंदन से मन ही मन प्रार्थना की हे यशोदा नंदन आज आप मेरी लाज रखें और सांची अलि (सच्ची सहेली) की भांति मेरी सहायता करें। अंतर्यामी श्रीकृष्ण ने श्रीजी की करुण पुकार को सुना और स्वयं चुनरी ओढ़कर देवी स्वरूप बनकर झाड़ियों में बैठ गए। इसे देखकर उनके मुख से बरबस ही निकल गया धन्य हो सांची सहेली। तभी से यहां देवी मां का यह स्वरूप उस वन में स्थापित हो गया।
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