राजकीय संग्रहालय में ब्रज की सांझी कला विषय पर व्याख्यान हुआ। इसमें साहित्यकार डा. नटवर नागर ने कहा कि संस्कृत का संध्या शब्द दो कालों के मिलने की वेला के लिए प्रयुक्त होता था, लेकिन अब यही शब्द अपभ्रंश होकर हिन्दी में समानार्थक संझा शब्द हो गया है। बालिकाओं द्वारा सांझी माता के पूजन की प्राचीन परंपरा है।
राजस्थान, मालवा, ब्रज, हरियाणा आदि अंचलों में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक सांझ के समय कुंवारी लड़कियां सुंदर-सुयोग्य वर प्राप्त करने की कामना से रोली, चावल, सिंदूर, दही आदि से सांझी माता की पूजा करके भोग लगाती हैं।
वक्ता ने इस परंपरा को श्रीकृष्ण के साथ जोड़कर भी कई उदाहरण दिए। व्याख्यान में चारों प्रकार के पत्रों की सांझी, फूलों की सांझी, गोबर की सांझी और सूखे रंगों की सांझी को बारीकी से समझाया। व्याख्यान में चंद्रकिशोर पाठक, श्यामसुंदर गोस्वामी, ताराचंद शर्मा, विजय कुमार आर्या, आरसी भाटिया आदि ने भाग लिया।