अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा केशीघाट
- फोटो : अमर उजाला वृंदावन
वाराणसी में गंगा किनारे घाटों की शृंखला से मिलती जुलती ही वृंदावन में यमुना किनारे घाटों की सुंदरता विश्वविख्यात है। यहां का प्राचीन केशीघाट तो भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का साक्षी है। लेकिन, देखरेख के अभाव में यह धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक स्थल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।
यमुना किनारे केशी घाट में दरारें हैं तो सीढ़ियों के पत्थर अपने स्थान से खिसक रहे हैं। कलात्मक मेहराब भी टूटकर गिर रहे हैं या जगह छोड़ रहे हैं। कई जगह से छज्जे क्षतिग्रस्त हैं। सौंदर्य की प्रतीक बुर्जियाें में भी दरारें हैं।
बता दें कि वृंदावन के तीन दर्जन से अधिक घाटों की शृंखला में बड़ी संख्या में घाट लुप्त हो चुके हैं। जो शेष हैं उनसे भी यमुना ने दूरी बना ली है। ऐसे में वृंदावन में यमुना किनारे घाटों के सौंदर्य का जिम्मा केवल केशीघाट पर है। लेकिन, वर्तमान अस्तित्व में इसकी स्थिति भी जर्जर दिखाई देती है।
विश्वविख्यात है सौंदर्य
ब्रज संस्कृति शोध संस्थान के सचिव लक्ष्मीकांत तिवारी के अनुसार ब्रज में यमुना के घाटों से ही यमुना और ब्रजभूमि की पहचान है। उन्होंने बताया कि केशीघाट का निर्माण भरतपुर के राजा सूरजमल की रानी लक्ष्मी ने 1760 में कराया था। उनका कहना है कि बीते वर्ष तक यमुना वृंदावन के प्राचीन केशीघाट को स्पर्श करती बह रही थी।
बीते कई महीनों से यमुना के जलस्तर में आई गिरावट के बाद यमुना केशीघाट से दूर हो गई है। यह घाट के लिए खतरनाक संकेत है।
पर्यावरणविद् डा. राजेश शर्मा बताते हैं कि भगवान कृष्ण ने अश्व रूपी राक्षस केशी का वध यमुना किनारे इसी स्थान पर किया था। इस कारण ही घाट का नाम केशीघाट पड़ा। वराह पुराण में इस स्थल की महिमा वराह भगवान ने स्वयं की है। वृंदावन में जहां केशी का वध हुआ, वह महापाप नाशक तीर्थ है।