लक्ष्मीजी ने वृंदावन में पाने के लिए किया था उपवास, दूल्हे के रूप में होती है पूजा
मंदिर के सेवक तिरुपतिजी ने बताया कि मान्यता के अनुसार, मां गोदा देवी ने भगवान रंगमन्नार या भगवान विष्णु को वृंदावन में पाने के लिए उपवास और प्रार्थना की थी। वे यमुना किनारे साधनारत रहीं। भगवान रंगनाथ ने उनका दूल्हा बनकर उनकी इच्छा पूरी की। यहां भगवान रंगनाथ को दूल्हे के रूप में पूजा जाता है। मंदिर के निर्माण की परिकल्पना वैकुंठधाम में निवासरत देवी-देवताओं पर की गई थी, ताकि श्रद्धालुओं को वैकुंठधाम में प्रभु की दिनचर्या, पूजन-पाठ, आहार विहार के दर्शन सुलभ हो सकें।
मंदिर में मुख्य अचल प्रतिमाओं के साथ हैं अलग-अलग पांच मूर्तियां
1. विशाल विग्रह - अचल प्रतिमाएं
2. उत्सव मूर्ति - ये चल प्रतिमाएं हैं, इन्हें विभिन्न अवसरों पर विहार के लिए निकाला जाता है। प्रभु को विहार कराने की परंपरा का उद्देश्य है कि समस्त ब्रह्मांड का कल्याण हो, सभी जीव-जंतु, वृक्ष व जगत प्रभु के दर्शन कर सकें। साल भर में मंदिर में 400 से अधिक बार प्रभु को विहार कराया जाता है।
3. यज्ञ मूर्ति - मंदिर में समय-समय पर होने वाले यज्ञ-अनुष्ठानों के दौरान प्रभु के मूल स्वरूप की ये लघु प्रतिमाएं विराजित की जाती हैं।
4. बलि प्रदान मूर्ति - ये वे प्रतिमाएं हैं, जिन्हें छोटी पालकी में विराजित कर नित्य रूप से प्रातः और संध्या में मंदिर परिसर की परिक्रमा कराई जाती है। इस दौरान पारंपरिक वाद्य यंत्र और मंत्र गूंजते हैं। परिक्रम के दौरान सूर्यादिक ग्रहों को प्रसादम् अर्पित किया जाता है।
5. शयन मूर्ति - शयन आरती के बाद सोने के झूले और चांदी के पलंग पर प्रभु शयन करते हैं।
पुष्करणी के पवित्र जल से मंदिर में ही बनता है प्रसाद
तिरुपतिजी ने बताया, प्रभु की सेवा-पूजा और अनुष्ठान का जिम्मा दक्षिण भारत के पंडित और उनके सहयोगी करते हैं। पूर्ण स्वच्छता और विधि-विधान से पीतल के बर्तनों में प्रसाद बनाया जाता है। मंदिर परिसर में मंडपम के एक छोर पर पुष्करणी (जलाशय/ बावड़ी) है, जिसमें भूगर्भ से स्वतः ही जल एकत्र होता है और इसी का जल प्रभु के प्रसाद को बनाने में काम आता है। वहीं, मंडपम् के दूसरी ओर लक्ष्मी जी की बगीची (शुक्रवारी बगीची) है, जिसमें भगवान को विहार कराया जाता है।