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Mathura News: ब्रज में सैंकड़ों वर्षाें से गाई भी जा रही होली

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वृंदावन। ब्रज भूमि में 41 दिनों तक खेले जानी रंगीली होली यहां गाई भी जाती है। सैकड़ों वर्षों से होली गायन की यह परंपरा निभाई जा रही है। इसमें विभिन्न धर्मों से संबद्ध अनेक रचनाकारों की लेखनी से होली पर लिखे पद व रसिया मंदिर व देवालयों में गाए जाते हैं।
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इतिहासकार आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी ने बताया कि रसिक संतों व कवियों ने भक्तिकाव्य में होली गायन का वर्णन किया है। स्वामी हरिदास, स्वामी हरिराम व्यास एवं स्वामी हित हरिवंश, अष्टछाप के कवियों में महाकवि सूरदास, मीराबाई सहित अमीर खुसरो जैसे कवियों ने भी होली को बखूबी गाया है। वसंत पंचमी से प्रारंभ हुए होली महोत्सव में विभिन्न वैष्णव सम्प्रदायों के अधिकांश प्रमुख मंदिर-देवालयों में संत- विद्वतजन ठाकुरजी के समक्ष होली के पदों का गायन करते हैं।
1107 छदों में सूरदास द्वारा रचित ब्रहद होली गीत सूर सरावली, मीराबाई द्वारा रचित साहित्य में होली के 78 पद, तुलसीदास कृत गीतावली में श्रीराम की होली का वर्णन रंगोत्सव की महत्ता दर्शाते हैं। स्वामी हरिदास की वाणी केलिमाल, लाल बलबीर का हजारा, चंद्रसखी, गुमान, नागरीदास, छबीले गोस्वामी, प्रेमबल्लभ, बलदेव आदि द्वारा लिखित ब्रज की होली के पद मंदिरों में गाए जाते है।
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वहीं पद्माकर, रत्नाकर, मैथिलीशरण गुप्त, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, रसखान (सैयद इब्राहिम) आदि के सवैया भी खूब गुनगुनाए जाते हैं। वृंदावन, मथुरा, बरसाना, नंदगांव, गोकुल, बलदेव स्थित मंदिर- देवालयों के साथ-साथ संत-महंतों के आश्रमों, मठों व तपोस्थलियों पर भी होली का गायन सुनने को मिलता है।
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