गोवर्धन (मथुरा)। गोवर्धन की परिक्रमा आस्था व विश्वास का प्रतीक मानी जाती है। यहां न कोई छोटा न बड़ा सब एक भाव में भक्त नजर आते हैं। यहां आने वाले भक्तों की बस एक ही चाह होती है कि रज के स्पर्श के साथ 21 किलोमीटर की परिक्रमा पूरी हो जाए। हालांकि ज्यादा भीड़ होने पर यहां लेटकर दंडवती परिक्रमा पर रोक रहती है।
ई रिक्शा व अन्य वाहन भी रोक दिए जाते हैं। परिक्रमा का पुण्य वही लोग ले पाते है जो कि सात कोस चलने की सामर्थ्य रखते हैं। अटूट श्रद्धा एवं आस्था का केंद्र गिरिराज धाम में हर महीने एकादशी से पूर्णिमा तक श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। यहां आने वाले लाखों भक्त ब्रज की रज में माथा टेककर सात कोस की परिक्रमा लगाते हैं। गिरिराज महाराज के प्रमुख मंदिरों में दूध भोग चढ़ाया जाता है। श्रद्धालु भक्त मानसी गंगा में स्नान करते हैं। हर महीने पांच दिन में यहां आने वाले भक्तों की संख्या लाखों तक पहुंच जाती है। गिरिराज की जी परिक्रमा उत्तर प्रदेश व राजस्थान की सीमा को जोड़ती है। संवाद
श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र गिरिराज धाम में एकादशी से पूर्णिमा तक परिक्रमार्थी भक्तों की भीड़ उमड़ती है। यूं तो गोवर्धन में वर्ष भर में श्रद्धालु गिरिराज जी की परिक्रमा लगाते हैं लेकिन महीने के पांच दिन गोवर्धन परिक्रमा में अटूट श्रद्धाभाव से प्रभु के जयकारों की गूंज जिस मनोरम दृश्य का सृजन करती है यह पुण्य एवं परम सौभाग्य की बात मानी जाती है। ब्रज मंडल के गोवर्धन तीर्थ का द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने मान बढ़ाया था। यहां पतित पावनी भगवान श्रीकृष्ण के मन से उत्पन्न मानसी गंगा है। राधाकुंड में राधा-श्याम कुंड का अनूठा संगम है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़े कुसुम वन सरोवर, गोविंद कुंड आदि धार्मिक स्थली हैं। गिरिराज महाराज की शिला खंडों को स्पर्श करना, शिलाओं पर दूध और पंचामृत से अभिषेक कर सात कोस की परिक्रमा व दंडवती लगाई जाती है। यहां परिक्रमा व दंडवती में बारिश की फिसलन, तेज धूप की गर्मी भी अटूट श्रद्धा के आड़े नहीं आती है। ब्रजरज में नंगे पैर परिक्रमा व लेटकर दंडवती लगाकर भक्त अपने आप को धन्य समझते हैं।