द्वापर में ब्रजवासियों ने भगवान कृष्ण को पूजा तो देवराज रूठ गए। वरुण देव का जमकर बरसने का आदेश दिया और ब्रज डूबने लगा। ऐसे में जगत के पालनहार ने गोवर्धन पर्वत को अपनी तर्जनी पर उठाकर ब्रज की रक्षा की और इंद्र का मान मर्दन किया।
कलियुग में यह दृश्य मानो फिर जीवंत हो उठा। साक्षात भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप यमुना महारानी की अविरल धारा के लिए ब्रजवासी आराधना कर रहे हैं। इसके लिए रविवार को दोपहर बारह बजे मंडी समिति प्रांगण से यमुना मुक्तिकरण पदयात्रा को दिल्ली रवाना होना था।
सुबह से आसमान में बिजली कड़क रही थी और तेज गड़गड़ाहट के बाद कभी तेज तो कभी धीमी बरसात ब्रजवासियों की परीक्षा लेने लगी। 12 बजकर 15 मिनट पर संत रमेश बाबा के आह्वान पर पदयात्रा शुरू हुई। पदयात्रा अभी हाईवे पर पहुंची ही थी कि रिमझिम झमाझम में बदल गई। इधर यमुना भक्तों के कदम और तेज हो गए। बरसात में मानमंदिर के बालक-बालिकाआें और बालाओं का उत्साह और बढ़ गया। भजन संकीर्तन पर इनके कदम थिरकने लगे। नन्हों के उत्साह से यात्रियों को भी ऊर्जा मिलने लगी। इस ऊर्जा ने इंद्र को निष्प्रभावी कर दिया। तेज बरसात में ही पदयात्री हरियाणा की सीमा में प्रवेश कर गए। यात्रा में कई बार ऐसा हुआ जब यात्रियों का उत्साह बरसात पर भारी पड़ा। लगा मानो कृष्ण के सखाओं ने इंद्र को झुकने पर मजबूर कर दिया।